एक अजीब जेनेटिक बीमारी लेकर 1996 में जन्मी आयशा का छह महीने की उम्र में बोन-मैरो बदला गया। वह ज़िंदा तो रही लेकिन उसके फेफड़े बहुत कमज़ोर हो गए। इतने ज़्यादा कि जीने के लिए उसे रोज़ संघर्ष करना पड़ता था। अपने इन्हीं संघर्षों को उसने 15 बरस की उम्र से दुनिया को बताना शुरू किया। वह एक नामी मोटिवेशनल स्पीकर बनी और एक किताब भी लिख डाली। लेकिन इस किताब के छप कर आने के अगले ही दिन 18-19 उम्र में वह चल बसी।

यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, सच्ची घटना है और फिल्म The sky is pink में इसे दिखाया भी बिल्कुल सच्चे अंदाज़ में गया है। यहां तक कि पात्रों के नाम, तारीखें, जगह वगैरह, सब कुछ वही हैं जो आयशा की ज़िंदगी में थे। जूही चतुर्वेदी और नीलेश मनियार के साथ मिलकर डायरेक्टर शोनाली बोस ने इस कहानी को विस्तार से फैलाया और समेटा है।

The Sky Is Pink Trailer

फिल्म आयशा से कहीं ज़्यादा उसके माता-पिता अदिति और निरेन के संघर्ष को दिखाती है कि कैसे वह अपनी बेटी को ज़िंदा, स्वस्थ और एक हद के बाद सिर्फ खुश भर रखने के लिए जुटे रहते हैं। इन्हें पता है कि आयशा जाने वाली है और ऐसे में इनका सिर्फ एक ही मकसद रह जाता है कि उसे जल्दी से जल्दी वह सारे अनुभव करा दिए जाएं जो इस उम्र की दूसरी आम लड़कियां कर लेती हैं।

अपने ही बेटे से बोल कर अपनी किशोर उम्र की बेटी के लिए उसके दोस्त के साथ डेट फिक्स कराती मां भला किस कहानी में दिखाई देती है। सच तो यह है कि यह फिल्म आयशा से ज़्यादा अदिति की कहानी कहती है, उसका संघर्ष दिखाती है। वही अदिति, जो अपनी बेटी की देखभाल करते-करते खुद पागलपन की हद तक जा पहुंचती है।

फिल्म का लुक भी भरपूर रियल रखने की कोशिशें हुई हैं। 1996 से 2015 तक की दिल्ली और लंदन के बीच गियर बदलती सीरियस कहानी को हल्का-फुल्का बनाए रखने की कोशिशें भी की गई हैं। लेकिन इसकी ढाई घंटे की लंबाई और कई जगह सुस्त रफ्तार इसे कुछ बोझिल बना देती है क्योंकि एक वक्त के बाद चीज़ों में दोहराव नज़र आने लगता है।

ऐसी फिल्मों में राहत के पल जितने और जिस किस्म के होने चाहिएं, वे नहीं हैं। जो सीरियस या इमोशनल पल हैं उनमें भी गाढ़ेपन की कमी दिखती है। इस किस्म की कहानी में दिल चीरने और आंखें नम करने का जो दम-खम होना चाहिए, वह भी इस फिल्म में हल्का रहा है।

अंत में जाकर संभलने और दिल छूने से पहले ही यह सब्र के इम्तिहान में दर्शक को फेल कर चुकी होती है। संवाद कहीं-कहीं अच्छे हैं, मारक नहीं। बतौर डायरेक्टर शोनाली के काम में मेच्योरिटी तो बेशक है लेकिन कहानी को आगे-पीछे करके बयान करने का स्टाइल अपनाकर वह कन्फ्यूज़ ज़्यादा करती हैं और इससे कई जगह फिल्म की लय टूटती है।

एक्टिंग में प्रियंका चोपड़ा (Priyanka Chopra) और फरहान अख्तर (Farhan Akhtar) की मेहनत साफ दिखाई देती है। प्रियंका की तारीफ उनकी एक्टिंग के साथ-साथ प्रोड्यूसर के तौर पर भी होनी चाहिए जो वह इस किस्म की फिल्मों पर दांव लगा रही हैं। काम बाकी सबका भी अच्छा है लेकिन बाज़ी मारती हैं आयशा बनीं ज़ायरा वसीम (Zaira Wasim)। ‘दंगल’ और ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ के बाद इस फिल्म में भी अपने भावों का परफैक्ट प्रर्दशन करने वाली ज़ायरा को शायद यह अहसास ही नहीं कि उनके अंदर कितनी कुव्वत है।

गाने अच्छे हैं। लेकिन गुलज़ार ने इन्हें जितना बेहतर लिखा है, प्रीतम उतनी शानदार धुनें नहीं बना पाए और इसीलिए ये अच्छे होने के बावजूद कच्चे लगते हैं।

इस किस्म की फिल्में आम दर्शकों में बहुत हिट नहीं होतीं। कुछ हटकर वाली कहानियों को हट कर वाले अंदाज़ में देखने वालों को यह फिल्म पसंद आएगी।

*यह समीक्षा लेखक के लोकप्रिय ब्लॉग cineyatra.com के इस लिंक पर भी उपलब्ध है।

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