अपनी आत्मकथा ‘समथिंग लाइक एन आटोबायोग्राफी’ (आत्मकथा जैसी कोई चीज) के परिशिष्ट में कुरोसावा ने ‘सिनेमा क्या है’ सवाल का बहुत दिलचस्प जवाब दिया है।

शुरू में उन्होंने यह स्वीकार कर लिया है कि इस प्रश्न का उत्तर आसान नहीं है। लेकिन जापानी उपन्यासकार शिगा नायोआ ने एक बार अपने पोते के लिखे निबंध ‘मेरा कुत्ता’ को एक ‘मास्टरपीस’ बताया। इस निबंध में उस बच्चे ने लिखा था-मेरा कुत्ता एक भालू से मिलता-जुलता है, वह एक लोमड़ी से भी मिलता-जुलता है, वह एक बिज्जू से भी मिलता-जुलता है…आदि-आदि। कुत्ते की खासियतों का जिक्र करते हुए उसकी तुलना तरह-तरह के जानवरों से की गई थी। पर अंत में एक वाक्य था-‘चूँकि वह एक कुत्ता है इसलिए वह सबसे ज्यादा एक कुत्ते से ही मिलता-जुलता है।’

यह पढ़कर कुरोसावा को बहुत हँसी आई। पर इस निबंध में उन्हें सिनेमा की एक गंभीर परिभाषा भी दिखाई दी। सिनेमा विधा कई अन्य विधाओं से मिलती-जुलती है। उसमें साहित्यिक गुण हैं, रंगमंच के भी गुण उसमें हैं, चित्रकला-मूर्तिकला, संगीत आदि विधाओं से भी सिनेमा को आसानी से जोड़ा जा सकता है। लेकिन अपने अंतिम निष्कर्ष में सिनेमा दरअसल सिनेमा ही है।

शायद इसी दृष्टि के कारण कुरोसावा को चित्रकला की तरह सिनेमा में अपनी निजी, मौलिक और विशिष्ट दृष्टि की बहुत अधिक चिंता नहीं करनी पड़ी। वह उन सभी विधाओं से जुड़े हुए थे जो सिनेमा को जन्म देती हैं। वह चित्रकार थे ही। साहित्य का भी उन्होंने बहुत गहरा अध्ययन किया था। दोस्तोएवस्की उनके प्रिय लेखक थे। अनेक प्रसिद्ध विदेशी साहित्यिक कृतियों का उन्होंने जापानीकरण किया। स्क्रीनप्ले-राइटिंग को वह बहुत अहमियत देते थे। लंबे समय तक साहित्य का गहरा अध्ययन उनके बहुत काम आया।

सत्यजित रे और कुरोसावा दोनों ही ‘रैनेसां कालीन व्यक्तित्व’ हैं-अनेक विधाओं पर लगभग समान अधिकार रखने वाले कलाकार। दोनों को ही शुरू में अपने-अपने देशों से अधिक विदेशों में मान्यता मिली।

दोनों ही इस समस्या का सामना करने के लिए मजबूर थे कि हम अपनी जमीन और परंपरा से इतना जुड़कर भी ‘पश्चिमी’ माने जा रहे हैं। क्योंकि ये दोनों फिल्मकार पश्चिम को लेकर जागरूक थे। और उससे एक रचनात्मक संवाद बनाए रखने की क्षमता रखते थे।

हॉलीवुड ने कभी तथाकथित कला फिल्मकारों के महत्त्व को दिल से नहीं स्वीकार किया। लेकिन कुरोसावा और सत्यजित रे को हॉलीवुड के मनोरंजन उद्योग ने भी अभूतपूर्व सम्मान दिया। बल्कि कुरोसावा इस दृष्टि से अद्वितीय फिल्मकार हैं। कुरोसावा की ‘राशोमोन’ (1950), ‘द सैवेन सामुराई’ (1954), ‘योजिंबो’ (1961) आदि फिल्मों से प्रेरित होकर क्रमशः ‘द आडटरेज’, ‘द मैग्नीफिसेंट सैवेन’ और ‘ए फिस्टफुल ऑफ डॉलर्स’ जैसी बहुचचिर्तत फिल्में हॉलीवुड या इतालवी वैस्टर्न फिल्म उद्योग द्वारा बनाई जा चुकी हैं।

पश्चिम आसानी से पूर्व को अपनी ‘ट्रिब्यूट’ नहीं देता है। कपोला, स्पीलबर्ग, जॉर्ज लूकस जैसे हॉलीवुड के फिल्मकार जब सुपरस्टार हो गए, तो उन्होंने कुरोसावा को ‘कागेमुशा’ (1980) बनाने के लिए निर्माण और डिस्ट्रीब्यूशन की सुविधाएँ भी दिलाईं। 1973 में तत्कालीन सोवियत संघ ने कुरोसावा को अपनी शर्तों पर ‘देरसू उजाला’ जैसी महत्त्वपूर्ण फिल्म बनाने के लिए धन दिया था।

1950 में ‘राशोमोन’ बनी और वेनिस के प्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय महोत्सव में उसे पुरस्कार और चर्चा मिली। पंद्रह सालों तक कुरोसावा जापान में अपनी शर्तों पर फिल्में बनाते रहे। लेकिन धीरे-धीरे उनकी मुश्किल फिल्म-निर्माण शैली ने जापानी स्टूडियो सिस्टम के सामने दुविधा की स्थिति बना दी। इसीलिए बाद में कुरोसावा को कुछ बाहरी स्रोतों की मदद से भी अपनी फिल्में बनानी पड़ीं।

जापान में अतीत को आधार बनाकर फिल्में बनाने की अद्वितीय परंपरा रही है। लेकिन कुरोसावा जिन योद्धाओं को लेकर अपनी फिल्में बनाना चाहते थे उनके लिए कई व्यावहारिक दिक्कतें पैदा हो गई थीं। मिसाल के लिए जापान में शूटिंग के लिए घोड़े आसानी से नहीं मिलते थे। ‘फार्मिंग’ में घोड़ों का काम नहीं रह गया था। सिर्फ घुड़दौड़ में उनकी भूमिका रह गई थी।

इसी तरह से कुरोसावा ने सत्यजित रे को एक बातचीत मंे बताया था कि जापान के पुरूष धीरे-धीरे पिछले 500-600 सालों में कदकाठी में छोटे होते चले गए हैं। सामुराई पोशाकों मेें फिट होने वाले एक्टर आसानी से नहीं मिलते हैं।
सुनने में ये कारण कुछ दिलचस्प और अजीब जरूर लगते हैं। पर फिल्म निर्माण की अपनी अलग ही शर्तें हैं। इस तरह की व्यावहारिक समस्याएँ कभी-कभी क्रिएटिविटी पर निर्णायक असर डालती हैं।

कुरोसावा जब अपनी सफलता के शिखर पर थे तो जापानी फिल्म सिस्टम में उन्हें ‘सम्राट’ (एंपरर) कहा जाता था। एक बार वह स्टूडियो में अपनी फिल्म के ‘रशेज’ देख रहे थे, तो स्टूडियो गाइड ने कुछ महिला अतिथियों से आभूषण वगैरह उतारकर भीतर जाने के लिए कहा ताकि ‘मास्टर’ को आभूषणों की हल्की सी खनक भी कहीं ‘डिस्टर्ब’ न कर दे।

एक बार अपनी फिल्म शैली पर बात करते हुए कुरोसावा ने कहा था, ‘‘आप जानते हैं कि मैं कैसे काम करता हूँ? बोलना, बोलना, बोलना-सब, यही मैं करता हूँ। लेखकों को एक साथ बिठाइए और स्क्रिप्ट पर बात कीजिए। अभिनेताओं को बिठाइए और एक्टिंग पर बात कीजिए। कैमरा टीम को बिठाइए और प्रोडक्शन की बात कीजिए। मैंने अपना सारा जीवन बोलते-बोलते बिताया है।’’

जब कुरोसावा युवा थे और फिल्मों में नहीं आए थे, आर्थिक तंगी के कारण पंेट करने के साधन जुटाना मुश्किल हो गया। तब वह दुनिया भर के साहित्य की पुस्तकें पढ़ते-पढ़ते जीवन बिताने लगे। रात को चादर में छिपकर किताबें पढ़ते थे। सड़क पर चलते-चलते किताबें पढ़ते थे।

कुरोसावा की महान फिल्मकला की कुछ-कुछ रहस्यमय कुंजियाँ इसी तरह की तमाम सच्चाइयों में छिपी पड़ी हैं। यह महान फिल्मकार अब हमसे स्वयं कभी नहीं बोलेगा। पर उसकी फिल्में हमेशा बोलती रहेंगी-कई तरह से और कई बार।

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