हर साल टीचर्स डे पर हमें अपने उन टीचर्स की याद आती है जिन्होंने कभी हमें संवारने-निखारने का काम किया था। आइए जानें छोटे-बड़े पर्दे से जुड़े कुछ कलाकारों से, क्या उन्हें अपने टीचर याद हैं और टीचर्स डे पर कैसे याद करते हैं वे अपने टीचर्स को..

हर्ष मायर, एक्टर, (फिल्म ‘आई एम कलाम’, ‘हिचकी’)

मैं दिल्ली के एक सरकारी स्कूल से पढ़ा हूं और बहुत कम उम्र में ही मैंने फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया था। पढ़ने-लिखने में मैं कुछ खास नहीं था और बाकी तमाम गतिविधियों में ही मशगूल रहता था। इस वजह से मेरे ज्यादातर टीचर मुझ से कोई खास मोहब्बत नहीं करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि मैं वक्त बर्बाद कर रहा हूं। लेकिन एक टीचर थे प्रेमचंद सर जो हमें इतिहास पढ़ाया करते थे। उनकी सोच कुछ अलग ही थी।

वह मानते थे कि विद्या सिर्फ क्लास रूम के अंदर ही नहीं मिलती है बल्कि पूरी दुनिया ही एक स्कूल है। इसीलिए वह हमेशा मुझे सपोर्ट करते थे कि जिस चीज में तेरा मन है, तू वही कर। उनका व्यवहार भी बहुत दोस्ताना किस्म का था और हम बड़े होते बच्चों को वह किसी टीचर की तरह नहीं बल्कि एक दोस्त की तरह मानते थे। जब भी अध्यापक दिवस आता है या कोई अपने किसी पसंदीदा टीचर की बात करता है तो मुझे प्रेमचंद जी की बहुत याद आती है और मन ही मन उन्हें प्रणाम कर लेता हूं।

इनामुल हक,एक्टर (फिल्म ‘जॉली एल.एल.बी. 2’, ‘नक्काश’)

पिछले साल टीचर्स डे पर मैंने पत्थरों की एक तस्वीर पोस्ट की थी और लिखा था-हैप्पी टीचर्स डे। सच यही है कि जीवन में मुझे ठोकरों ने जितना सिखाया, उतना किसी टीचर ने नहीं। खैर, यह तो दार्शनिक बात हुई। अगर किसी एक टीचर की बात करूं तो दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एन.एस.डी.) के मेरे टीचर अभिलाष पिल्लई का मैं सदा आभारी रहूंगा। आते तो थे वह हमें निर्देशन पढ़ाने लेकिन उनको देख कर मैंने यह सीखा कि अभिनय की बारीकियां क्या होती हैं। वह इतने अच्छी तरह से हर चीज समझाते थे कि उनका समझाया हुआ सीधे दिल में उतर जाता थां हर साल टीचर्स डे पर मैं उन्हें जरूर धन्यवाद देता हूं।

बिदिता बाग, एक्ट्रेस (फिल्म ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’, ‘द शोले गर्ल’)


मेरा तो यह मानना है कि जितने भी कलाकार होते हैं, उनके कलाकार बनने के पीछे उनके स्कूल और कॉलेज के ही टीचर्स का हाथ होता है। मैं जब हावड़ा के सांतरागाछी केंद्रीय विद्यालय में पढ़ती थी तो मेरी एक टीचर होती थीं मिस रत्ना दास। उन्होंने ही सबसे पहले यह नोटिस किया कि मेरे अंदर कला को लेकर, गाने को लेकर रुझान है तो उन्होंने मुझे इसके लिए प्रेरित करना शुरू किया। इससे मेरी इस तरफ दिलचस्पी बढ़ती चली गई और साथ ही साथ मेरे अंदर नेतृत्व क्षमता का भी विकास हुआ।

बाद में जादवपुर विश्वविद्यालय में पढ़ते समय मैं मॉडलिंग करने लगी तो मेरे टीचर्स पढ़ाई और हाजिरी को लेकर मुझे काफी सपोर्ट करते थे। मैं आज अगर फिल्मों और माॅडलिंग में सक्रिय हूं और अपनी शर्तों पर काम कर पा रही हूं तो यह मेरे उन टीचर्स की दी हुई हिम्मत और प्रेरणा के ही कारण है।

श्रुति शर्मा, एक्ट्रेस
(फिल्म ‘गली गुलियां’, धारावाहिक ‘कुल्फी कुमार बाजेवाला’)

जयपुर के इंडिया इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ने के दौरान ही मेरे अंदर एक्टिंग के प्रति दिलचस्पी जगने लगी थी। और हैरानी की बात यह है कि मेरे इस गुण का पता मुझसे पहले मेरी कैमिस्ट्री की टीचर को लगा। तब मैं नौवीं क्लास में थी जब उन्होंने मुझसे एक छोटा-सा नाटक तैयार करने को कहा। जब मैंने कहा कि मैं नहीं कर पाऊंगी तो उन्होंने मेरा हौसला बढ़ाया और कहा कि कोशिश करो, मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। बस, उसके बाद मैं इस तरफ बढ़ती चली गई।

बाद में वहीं के जवाहर कला केंद्र में गई तो वहां पर विजय कुमार सर मिले जो जितने अच्छे अभिनेता हैं, उतने ही अच्छे शिक्षक भी। फिर मुंबई आई तो यहां भी बहुत सारे लोगों ने मेरा मार्गदर्शन किया जिनमें से मनोज वाजपेयी सर ने बहुत कुछ सिखाया। उनके साथ काम करते हुए एक्टिंग के सभी पहलुओं पर हमारी काफी बातें होती थीं। उनसे ही मैंने यह सीखा कि एक कलाकार को किस तरह से अपने किरदार में डूबना आना चाहिए।

नमित दास, एक्टर (फिल्म ‘सुई धागा’, ‘पटाखा’)

मुंबई के भवन वाडिया हाई स्कूल की मेरी इंगलिश टीचर मिस सविता घोलकर का मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ा। वह पढ़ाने के साथ-साथ अक्सर हमसे जिंदगी को लेकर, उसूलों को लेकर बहुत सारी बातें करती थीं जिनमें काफी सकारात्मकता होती थी। स्कूली दिनों में तो वह सब इतना समझ नहीं आता था लेकिन बाद में उनकी बातें बहुत याद आईं और जब कभी भी मैं कहीं अटका या मुझे मार्गदर्शन की जरूरत पड़ी तो उनकी उन बातों ने मुझे काफी सहारा दिया।

बाद में कॉलेज में इंगलिश लिटरेचर की मेरी टीचर मिस शेफाली और मिस नीति ने भी मेरे विकास में अहम भूमिका निभाई। मुझे तो लगता है कि दुनिया में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण काम टीचर का ही होता है जो एक पूरी पीढ़ी को तैयार करते हैं ताकि हम लोग स्कूल-कॉलेज से बाहर जाकर जीवन की मुश्किलों का सामना कर सकें।

राजेश्वरी सचदेव, एक्ट्रेस
(फिल्म ‘फायरब्रांड’, धारावाहिक ‘दिल ही तो है’)

मुझे बहुत सारे ऐसे टीचर्स मिले जिन्होंने मुझे अलग-अलग तरीकों से, अलग-अलग बातों से जिंदगी के हर कदम पर प्रेरित किया। लेकिन मेरी एक टीचर मुझे अक्सर याद आती हैं जो हमारे स्कूल की प्रिंसीपल मिसेज वर्गीस थीं। दरअसल मैंने छोटी उम्र से ही शास्त्रीय नृत्य सीखना शुरू कर दिया था तो जब डांस का आखिरी साल था तो स्कूल का भी आखिरी साल था लेकिन उस साल मेरी डांस क्लास शाम की बजाय सुबह होने लगी और मैं हफ्ते में तीन दिन 10 मिनट की देरी से स्कूल पहुंचने लगी। एक हफ्ता तो किसी ने कुछ नहीं कहा लेकिन फिर मुझे प्रिंसिपल मैडम ने बुलाया और जब मैंने उन्हें वजह बताई और कहा कि अगर आप मुझे इजाजत नहीं देंगी तो मुझे डांस छोड़ना पड़ेगा और अगर आप इजाजत देंगी तो मेरा वादा है कि सिर्फ दस ही मिनट लेट आऊंगी। तब उन्होंने मुझे इजाजत दी और इस तरह से मैं अपनी डांस क्लास जारी रख पाई।

मुझे लगता है कि इस तरह के टीचर्स होने बहुत जरूरी हैं जो सिर्फ नियमों की ही दुहाई न दें बल्कि हालात को समझते हुए बच्चों को उनकी रूचियों की तरफ भी बढ़ने दें। मैं बहुत लकी हूं कि मुझे ऐसे बहुत सारे गुरु मिले और आज भी जब कभी मैं स्टेज पर जाती हूं तो पर परफोर्मेंस से ठीक पहले मैं अपने उन सारे टीचर्स को, सारे गुरुओं को याद करती हूं जिन्होंने मुझे एक अच्छा इंसान, एक अच्छा आर्टिस्ट बनने में मदद की।

बोइशाली सिन्हा, आर्ट डायरेक्टर
(फिल्म ‘राउडी राठौड़’, ‘गब्बर इज बैक’)

मुझे हमेशा से ही अपने टीचर्स का भरपूर प्यार मिला है। सबसे पहले तो मेरे पापा ने मुझे बढ़ावा दिया। चूंकि कला के प्रति मेरे अंदर बचपन से ही दिलचस्पी थी तो मेरे पापा मुझे हर पेंटिंग प्रतियोगिता में लेकर जाते थे। उन्हें लगता था कि मेरी ड्राइंग इतनी अच्छी है तो मुझे इसी को अपना कैरियर बनाना चाहिए।

उन्हीं की प्रेरणा से मैं आगे बढ़ी और ग्रेजुएशन करने के बाद मैं मास्टर्स की पढ़ाई के लिए फ्रांस चली गई जहां मैं किसी को नहीं जानती थी। वहां मेरी टीचर मिस मार्टेलिन कास्टेलिन ने हर कदम पर मेरा साथ दिया और मेरे अंदर की प्रतिभा को निखार कर बाहर निकाला। दिल्ली में मेरे कॉलेज के दिनों की टीचर डॉ. अलका पांडे ने भी मुझे कदम-कदम पर सिखाया, संभाला और आज भी वह मुझे अपनी बातों से प्रेरित करती रहती हैं।

डोनल बिष्ट, एक्ट्रेस
(धारावाहिक ‘दिल तो हैप्पी है जी’, ‘एक दीवाना था’)

मैंने दिल्ली के एशियन स्कूल ऑफ मीडिया स्टडीज से जनसंचार की पढ़ाई की है। वहां पर मेरे एक टीचर होते थे ओम गुप्ता जी जो कि एक नामी पत्रकार थे। न सिर्फ उनका पढ़ाने का तरीका दूसरों से अलग था बल्कि जिस तरह से वह हम लोगों को दिशा दिखाते थे, हर बात में बढ़ावा देते थे, उसे मैं कभी नहीं भूल सकती।

किताबी बातों से परे वह व्यावहारिक ज्ञान इक्ट्ठा करने पर और बाहर निकल कर सीखने पर जोर देते थे। मेरे अंदर के लेखक को सबसे पहले उन्होंने ही पहचाना। उन्हीं की प्रेरणा से मैंने लिखना शुरू किया और दिल्ली मीडिया में बतौर पत्रकार पहचानी गई। आज मैं भले ही अभिनय की दुनिया में आ चुकी हूं लेकिन उनकी सिखाई बातें मुझे हमेशा याद आती हैं और मैं उन बातों से आज भी प्रेरित होती हूं।

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