‘पल पल दिल के पास’ करण देओल और सहर बाम्बा की डेब्यू फिल्म है। जब से सन्नी देओल ने बेटे करण को लॉन्च करने की अनाउंसमेंट की थी तभी से इस फिल्म का इंतजार होने लगा था। इस फिल्म के इंतजार की दूसरी बड़ी वजह थी सन्नी पाजी का डायरेक्शन। जी हां, इस फिल्म से पहली बार सन्नी देओल डायरेक्टर के रूप में सामने आए हैं। तीसरी इंटरेस्टिंग वजह है नई एक्ट्रेस सहर बाम्बा का डेब्यू। यही तीनों फिल्म के मुख्य आकर्षण हैं और इस रिव्यू में हम इनके परफॉरमेंस पर ही ज्यादा फोकस करेंगे।

करण सहगल (Karan Deol) मनाली के दुर्गम पहाड़ी इलाकों में से एक ‘उझी धार’ में ट्रैकिंग के शौकीनों के लिए ट्रैकिंग कैम्प चलाता है। हर बंदे के लिए फीस है पांच लाख। सहर सेठी सेलेब्रिटी वीब्लॉगर है और उसे शक है कि यह ट्रैकिंग एजेंसी स्कैम कर रही है। ट्रैकिंग के लिए इतना हेवी चार्ज नहीं हो सकता। वो अपनी कंपनी की तरफ से इसकी जांच करने और अपने वीडियो ब्लॉग में इसकी लाइव रिपोर्ट देने उझी धार कस्टमर बनके जाती है।

निगेटिव रिपोर्टिंग से वो स्टार्ट करती है। लेकिन जल्द ही उसके सामने एक ऐसी दुनिया खुलती है जिसकी उसने कल्पना तक नहीं की थी। एडवेंचर से भरपूर यह ट्रैकिंग कैम्प उसके लिए यादगार अनुभव बन जाता है। सहर खुद हिम्मत और हौसले से लबरेज है लेकिन करण एडवंचर की जिस हद तक उसे ले जाता है और उसकी वजह से उन पहाड़ियों में उसे जो स्पिरिचुअल फीलिंग्स होती हैं वो उसे पॉजिटिव रिपोर्ट देने को मजबूर कर देती है।

अब है फिल्म का रोमैंटिक एंगल। ट्रैकिंग के दौरान एक रात सहर करण से पूछती है, इतने लोग ट्रैकिंग के लिए आते होंगे। उनमें बहुत सी लड़कियां भी रही होंगी। क्या किसी से दिल नहीं लगा? करण कहता है, सब चले जाते हैं और भूल जाते हैं। लेकिन सहर करण को नहीं भूलती। और लौटते हुए उसे एक बहुत इमोशनल और खास तोहफा देकर जाती है। और जैसा कि उम्मीद थी, जल्द ही दोनों एक दूसरे को चाहने लगते हैं।

सहर की फैमिली से कोई बड़ी प्रॉब्लम नहीं आती। और करण के पास कोई फैमिली है नहीं। उसके पैरेंट्स फोटोग्राफर थे। और खतरनाक पहाड़ों पर फोटोग्राफी के दौरान ही बर्फ में धंसकर बरसों पहले उन दोनों की मौत हो गई थी। करण की बचपन की दोस्त और ट्रैकिंग बिजनेस में पार्टनर है, वो भी सहर से दिल्ली जाकर मिलने के लिए हौसला बढ़ाती है।

कहानी में ट्विस्ट ये है सहर का एक ब्वॉयफ्रेंड रहा है जिसकी बदमिजाजी के कारण पहले वो उससे ब्रेक लेती है और फिर ब्रेक अप कर लेती है। ब्वॉयफ्रेंड भी कहता है— नो हार्ड फीलिंग्स। हम हमेशा फ्रेंड रहेंगे। मगर करण से मिलने के बाद वह बहुत जल्द अपनी हार्ड फीलिंग्स दिखा देता है। उसकी जोर जबरदस्ती में सहर के सिर में गहरी चोट आती है और वो कोमा में चली जाती है। आगे की कहानी के लिए फिल्म देखनी होगी।

फिल्म की स्क्रिप्ट में बहुत चौंकाने वाली चीजें या ट्विस्ट नहीं हैं। कूल सी कहानी है। कहने का अंदाज बहुत नया या ट्रेंडसेटर किस्म का नहीं है। इमोशनल ड्रामा है, युवा रोमांस है, फैमिली बॉन्डिंग है। राजनीतिक प्रतिद्वं​द्विता है। एक्शन है। और हैप्पी एंडिंग है। फिल्म सन्नी देओल के बेटे की है, सन्नी देओल खुद डायरेक्टर हैं, लेकिन करण की फिल्म में एंट्री बहुत धमाकेदार अंदाज में नहीं हुई है। एक अच्छे और मिलनसार लड़के के रूप में उसका इंट्रोडक्शन एक गाने के साथ होता है।

डायरेक्शन की बात करें तो सन्नी देओल ने बखूबी नए रोल में अपने को फिट किया है। कुछ ऐसा है जो उन्होंने अपने बेटे के लिए बचाकर रखा था और वो है ट्रैकिंग के एडवेंचरस सिक्वेंसेस। उसमें आप खो जाते हैं। किसी भी हिंदी फिल्म में यह पहली बार हुआ है। पांच दिनों के खतरनाक कैम्प के आप गवाह बनते हैं। लगभग चालीस मिनट तक परदे पर ये सब चल रहा होता है और आप चाहने लगते हैं कि ये सब चलता रहे। इसके लिए सिनेमटोग्राफी की जितनी भी तारीफ की जाए कम है। एकदम वर्ल्ड क्लास।

फिल्म में गरम रोमांस नहीं है बल्कि मीठा रोमांस है, बिलकुल सन्नी देओल की पहली फिल्म की तरह। करण देओल का भोला भाला रूप उन्होंने दिखाने की कोशिश की है और इसमें वे कामयाब हैं। लेकिन सन्नी देओल का पुत्तर ढिशुम ढिशुम न करे तो बात कुछ जमती नहीं। और करण देओल ने फिल्म के सेकेंड हाफ में सन्नी देओल स्टाइल का एक्शन दिखाया है। चेहरे पर वही गुस्सा। वही पिटाई कुटाई। और करण की भोली सूरत के बावजूद ये अंदाज उन पर जमता है।

एक्टिंग की बात करें तो करण एक्टिंग में अभी बीस से दो कम हैं। उन्हें एक्टिंग में अभी और मेहनत करके वेरायटी और मेच्योरिटी लानी होगी। उनकी आंखें हमेशा भोली मासूम बनी रहती हैं जो कई बार सपाट मालूम होती हैं। उन्हें लंबा टिकना है तो चेहरे के एक्सप्रेशंस पे बहुत काम करना होगा। उनके मुकाबले सहर बाम्बा ने ज्यादा टैलेंट दिखाया है। उनकी एक्टिंग ज्यादा प्रोमिसिंग है और उन्हें ज्यादा मौके मिले तो शायद वो बहुत अच्छा करेंगी। ‘दिल उड़ा पतंगा’ गाने में अपनी सहजता से वो दिल जीतने का काम करती हैं।

अन्य कलाकारों की एक्टिंग मंझी हुई है। लगभग सभी आजमाए हुए और अनुभवी एक्टर्स हैं।

फिल्म में कई गाने हैं। लेकिन याद रहने लायक ज्यादा नहीं हैं। ‘दिल उड़ा पतंगा’ गाना गुनगुनाने लायक है। इशक छलिया पार्टी सॉन्ग है। ‘हो जा आवारा’ देखने में ज्यादा मनभावन है। टाइटल सॉन्ग ओरि​जनल गाने की तरह यादगार हो सकता था लेकिन एक तो किशोर कुमार जैसी कशिश भरी सुरीली आवाज कहां से लाएं और फिर मेलोडी भी अब शायद टॉफी के ब्रांड तक ही कई बार सीमित दिखती है।

कुल मिलाकर कहें तो सन्नी देओल को 8 नंबर। करण देओल को 6 नंबर और सहर बांबा को 7 नंबर दिए जा सकते हैं। फिल्म एक बार देखकर एंज्वॉय करने लायक है।

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