लाल कप्तान (Laal Kaptaan) पूरी तरह एक ओरिजिनल फिल्म है। लाल कप्तान के ट्रेलर और पोस्टर्स से यह जिज्ञासा तो जरूर पैदा हो गई थी कि आखिर लाल कप्तान है क्या, किस बारे में है?

बदले की कहानी है, यह तो बताया गया लेकिन बदला किस चीज का? सैफ को नगा साधु बताया दिखाया गया, लेकिन नगा साधु किस बात का बदला लेगा? ट्रेलर में उसे क्रूर, भयानक और रहस्यात्मक दिखाया गया। और यह मानना पड़ेगा कि फिल्म के कंटेट को लेकर रहस्य बनाए रखने में निर्माताओं को पूरी कामयाबी मिली। फिल्म में भी रहस्य या सस्पेंस को आखिरी सीन तक बचाकर रखा गया है, खासकर लाल कप्तान यानी यह विद्रोही नगा साधु है कौन, यह रहस्य बिलकुल अंत में खुलता है, तब तक उसके सारे कारनामे दर्शक देख चुका होता है।

फिल्म 18वीं सदी के ऐतिहासिक माहौल को उसके पूरे वातावरण के साथ रचती है, जिसमें बीहड़ हैं, राजा हैं, अंग्रेजों की साजिश और भिड़ंत है, नगा साधुओं का साहस है, बिजली नाम की कोई चीज नहीं, इसलिए अंधेरा है। यह बार बार अंधेरा, बीहड़ों की वीरानियत और सन्नाटा इतनी खूबी के साथ रचा गया है कि आप दंग रह जाते हैं। मुंह से बजने वाली सीटी की आवाज भी गूंजती रहती है, टूटी हुई जंजीरों की झनकार भी। इसके लिए फिल्म को स्लो रखने का जोखिम भी उठाया गया है। लेकिन इसका जो रिजल्ट निकलकर आया है वो फिल्ममेकिंग की दृष्टि से काबिलेतारीफ है।

सिनेमा सिर्फ हीरो हीरोईन और विलेन के डायलॉग और स्टंट और रोमांस से नहीं बनता, वह परदे पर इमेज और साउंड के जरिए रची गई कहानी है। इमेज और साउंड ही इसकी मुख्य लैंगुएज है। इस नजरिए से देखें तो लाल कप्तान एक पूरी तरह से ओरिजिनल फिल्म है। इसमें बखूबी वो दिखाया गया है, जो हिंदी सिनेमा में पहले नहीं देखा गया।

लाल कप्तान में 18वीं सदी के उत्तर भारत के राजनैतिक माहौल को पूरी प्रामाणिकता के साथ और बहुत रियलिस्टक तरीके से दिखाया गया है। फिल्म में किसी ऐतिहासिक किरदार को नहीं दिखाया गया है। सभी किरदार रिप्रजेंटेटिव किरदार हैं। इससे इतिहास के साथ नगा साधु के मुख्य और काल्पनिक किरदार का मेल कराने में डायरेक्टर और लेखक को सहूलियत हो गई है और इतिहास के साथ छेड़छाड़ के इलजाम से भी डायरेक्टर और रायटर बरी हो गए हैं।

लेकिन फिल्म को देखकर आपको गहराई से इसका अहसास होगा कि राइटर और डायरेक्टर ने उस वक्त के इतिहास को लेकर अच्छा रिसर्च किया है और ऐतिहासिक घटनाओं और तारीखों को लेकर बहुत सावधानी बरती है।

एक्टिंग की बात करें तो फिल्म में हर किरदार बहुत मजबूती से रचा गया है और सबने अपनी एक्टिंग में जान भर दी है। लेकिन सैफ अली खान (Saif Ali Khan) और दीपक डोबरियाल (Deepak Dobriyal) ने परदे पर अपनी एक्टिंग की जो धूम मचाई है, उसकी लंबे समय तक चर्चा होती रहेगी। सैफ अली खान अपने किरदार में डूब गए हैं, और इस किरदार की इससे बढ़िया कास्टिंग हो नहीं सकती थी। Hats off! और दीपक डोबरियाल भी कम नहीं पड़े हैं। बल्कि फिल्म में दोनों ही अपने बेस्ट फॉर्म में हैं।

यहां 13 साल पहले आई विशाल भारद्वाज की फिल्म ओमकारा में इन दोनों कलाकारों की शानदार एक्टिंग को याद किया जा सकता है। ओमकारा (Omkara) से ही दीपक डोबरियाल को पहचान मिली ​थी और लंगड़ा त्यागी का किरदार निभाने वाले सैफ अली खान का एक शानदार एक्टर के रूप में लगभग पुनर्जन्म हुआ था।

ओमकारा में सैफ और दीपक डोबरियाल का यादगार सीन

सोनाक्षी सिन्हा (Sonakshi Sinha) नूर बाई के संक्षिप्त रोल में ​लाल कप्तान में कुछ देर के लिए दिखाई दी हैं। फिल्म के फीमेल लीड के तौर पर जोया हुसैन (Zoya Hussain) ने अपनी जबरदस्त ​एक्टिंग से प्रभावित किया है। एक छलिया, एक मां और एक रहस्यात्मक प्रेमिका के रोल को उन्होंने जीवंत कर दिया है। सिमोन सिंह भी एक ठसक वाली बेगम के किरदार में जंची हैं।

सैफ के साथ जोया हुसैन

फिल्म के मुख्य विलेन रहमत खान के किरदार में मानव विज (Manav Vij) का कमाल दर्शक फिल्म देखकर ही महसूस कर पाएंगे। रहमत खान की क्रूरता, उसकी दृढ़ता और उसकी दुविधा को मानव विज ने यादगार बना दिया है, जो ऐतिहासिक वातावरण वाली ऐसी फिल्म के लिए बेहद जरूरी है।

फिल्म के सिनेमटोग्राफर शंकर रमन (Shankar Raman) को सौ में सौ नंबर मिलने चाहिए। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर भी शानदार है जो अनजाने वातावरण और थ्रिल के मूड को बहुत कायदे से उभारता है, जिसके लिए बेनेडिक्ट टेलर की भरपूर तारीफ करनी होगी।

एनएच10 और मनोरमा सिक्स फीट अंडर जैसी कामयाब सस्पेंस थ्रिलर बना चुके डायरेक्टर नवदीप सिंह (Navdeep Singh) के लिए लाल कप्तान (Laal Kaptaan) बनाना एक जबरदस्त चैलेंज से कम नहीं रहा होगा। एनएच 10 के चार साल बाद उन्होंने यह फिल्म बनाई है। वही अत्याचार, बदले और हर पल जिंदगी और मौत का खेल, लेकिन एक साहसिक और बिलकुल अनोखे किरदार को कंविंसिंग तरीके से सामने लाने की चुनौती नवदीप के सामने रही होगी और फिल्म का ऐतिहासिक सेटअप होने के कारण एक तरह का एपिक रचने की महत्वाकांक्षा भी। और हम कह सकते हैं कि इसमें नवदीप को पूरी कामयाबी मिली है।

किरदार काल्पनिक है तो आप उस पर विश्वास कर भी सकते हैं और नहीं भी कर सकते हैं लेकिन परदे पर वह किरदार पावरफुल बनकर उभरा है। हां, फिल्म की स्पीड को लेकर डायरेक्टर और एडिटर के 100 में 10 नंबर काटे जा सकते हैं। क्योंकि फिल्म की स्पीड थोड़ी स्लो होने के कारण यह आम दर्शकों के धैर्य की थोड़ी परीक्षा ले सकती है। इसके अलावा जिन दर्शकों का इतिहास का ज्ञान जीरो है और जिन्हें इतिहास की घटनाओं और पुराने दौर में कोई दिलचस्पी नहीं है, वो दर्शक इस फिल्म से थोड़ा कम रिलेट कर पाएंगे। उन्हें सिर्फ थ्रिल, एक्शन और स्टंट का इंतजार रहेगा जो शायद इस फिल्म का मुख्य उद्देश्य नहीं है।

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here