सलमान की फिल्म रिलीज हो और टिकट खिड़की पर मार न हो, यह हो नहीं सकता। सभी थिएटरों में यह आम नजारा है। सलमान के फैंस लंबी-लंबी लाइनों में लगे हुए हैं। ईद के त्योहार पर ये ‘भाई’ का गिफ्ट है। हालांकि सलमान का फैन बेस काफी बड़ा है। इसमें हिंदू-मुस्लिम सब शामिल हैं। और खासकर फैमिली और बच्चे। तो आइए, जानते हैं क्या भाई ने ‘भारत’ से सबको खुश किया है?

फिल्म शुरू होती है भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के वक्त से। बंटवारे के वक्त हुए दंगों के बीच जान बचाकर गौतम (जैकी श्रॉफ) अपने परिवार को पाकिस्तान से निकालकर ट्रेन से हिंदुस्तान ले जा रहा है। पूरा परिवार ट्रेन में बैठ जाता है। लेकिन दंगाइयों की भीड़ और जान बचाकर भाग रहे लोगों की धक्कामुक्की में 8-9 साल के भारत के कंधे पर बैठी उसकी छोटी बहन गुड़िया नीचे गिर जाती है। गौतम भारत से वादा लेता है कि वह पूरे परिवार का ख्याल रखेगा और गुड़िया को ढूंढने ट्रेन से उतर जाता है। इस बीच ट्रेन आगे बढ़ जाती है।

बचा हुआ परिवार हिंदुस्तान पहुंचता है और यहां से शुरू होती है भारत (सलमान) के संघर्ष और जिम्मेदारियों की दास्तान। इसमें उसका साथ देता है उसका दोस्त विलायती (सुनील ग्रोवर)।

सर्कस में ट्रेनिंग के बाद सर्कस में मौत के कुएं के जांबांज बाइकर से शुरू होकर भारत का अगले 60 सालों तक का सफर दिखाया गया है।

इस बीच अरब में तेल के कुओं, गैस पाईपलाइन और शिपिंग में वह तरह-तरह के काम अपनी जान जोखिम में डालकर करता है। उसे बस एक बात याद है, उसे पूरे परिवार का ख्याल रखना है। यही वजह है कि वह सर्कस की राधा दिशा पटानी को पीछे छोड़ देता है जो उससे प्यार करती है। अरब जाता है तो कुमुद कटरीना कैफ को प्यार करने के बावजूद उसके प्रपोज करने पर वह मना कर देता है कि प्यार और परिवार में मैं बंट जाउंगा।

यह एक तरफ फैमिली बॉन्डिंग की कहानी है, परिवार के मिलने—बिछुड़ने की कहानी है। दूसरी तरफ एक नौजवान के अपनी फैमिली के प्रति कमिटमेंट की कहानी है। और तीसरी तरफ भारत और कुमुद के रोमांस की कहानी है।

 

फिल्म में अलग-अलग दौर को दिखाया गया है और सबमें भारत की खतरों से जूझने की ताकत को जमकर दिखाया गया है। फिल्म में जितनी बार उसके साथी भारत-भारत चिल्लाते हैं उतनी बार लगता है पूरे देेश को आवाज लगाई जा रही है। भारत को उसके पिता ने देशभक्ति सिखाई थी और भारत यह कभी नहीं भूलता। और एक बार अरब नौकरी करने जाते वक्त वह अपने सुपरवाईजर और बाकी मजदूरों से जन-गण-मन भी गवाता है।

क्या फिल्म काबिले तारीफ बन पाई है?

सबसे पहले तो ये कि सलमान की फिल्म लोग सलमान को देखने जाते हैं, एक्टिंग की गहराई और स्क्रिप्ट की बारीकियां देखने नहीं। फिर भी बजरंगी भाईजान और और सुलतान जैसी उनकी हाल की फिल्मों ने उनसे उम्मीदें बहुत ज्यादा बढ़ा दी हैं।

भारत एक फैमिली फिल्म है। इसमें रोमांस है लेकिन परिवार के धागों से बंधा हुआ।

अलग-अलग दौर में भी भारत अपने परिवार को नहीं भूलता। अपने खोए पिता और बहन गुड़िया से फिर से मिलना चाहता है। जिसमें 1990 के बाद देश में आए आर्थिक नीतियों में बदलाव और प्राइवेट टीवी चैनलों के आने से उसे मदद मिलती है। कुमुद जी टीवी की क्रि​एटिव डायरेक्टर बनकर उसके मिशन को पूरा करने की कोशिश करती है। जी टीवी के एक शो के जरिए बंटवारे के दौरान हिंदुस्तान और पाकिस्तान के कई बिछुड़े हुए लोगों को फिर से मिलते दिखाया गया है। फिल्म जब भी बजरंगी भाईजान मोड में जाती है तो उसकी गहराई बढ़ जाती है और दर्शक इमोशनल होते हैं।

एक्टिंग की बात करें तो ​सलमान पूरी फिल्म में छाए हुए हैं। करियर के तीस साल गुजार देने के बाद भी वो 25—30 साल के किरदार में मिसफिट नहीं लगते। वजह वही फैमिली की कहानी। एक्टिंग में दूसरे नंबर पर कोई है तो वो हैं सुनील ग्रोवर जिन्होंने भारत के दोस्त विलायती के दोस्त का किरदार क्या खूब निभाया है।

सुनील ग्रोवर ने कॉमेडी भी अच्छी की है। और भी कुछ कुछ किरदार फिल्म में रखे गए हैं जिनसे कॉमेडी का सामान इकट्ठा हुआ है।

कुमुद के किरदार में कैटरीना जंची हैं। उनका उच्चारण अभी भी नहीं सुधरा है लेकिन फिर भी देसी अंदाज दिखा पाने में वो कामयाब हुई हैं। उनका डांस और गाने विदेशी लोकेशन और पहाड़ समुंदर के बीच नहीं रखे गए हैं। जैसा सलमान के साथ कई फिल्मों में हुआ है।

राधा के रूप में दिशा पटानी को बहुत छोटा रोल मिला।

बचपन से जवानी तक भारत के साथ होने के बाद फिर फिल्म में वह दुबारा नहीं आतीं। किसी मौके पर उन्हें मिलाना चाहिए था। हमें पता नहीं चलता, उसका आगे क्या हुआ।

नोरा फतेही और छोटे रोल में आई हैं। एक गाने के बाद विलायती की बीवी के रोल में। फिल्म में बाकी सभी कलाकारों ने छोटे—छोटे रोल में भी अपनी एक्टिंग की छाप छोड़ी है। तब्बू थोड़ी देर के लिए परदे पर आती हैं और दर्शकों की तालियां बटोर लेती हैं। जैकी श्रॉफ भारत के पिता के रोल में परदे पर भारत की यादों में कई बार आते हैं। और हर बार अच्छे लगे हैं। भारत की मां के किरदार को सोनाली कुलकर्णी ने बखूबी निभाया है। हालांकि मां के किरदार में बहुत विविधता नहीं दिखाई गई है जिससे उनकी एक्टिंग और उभर पाती।

स्क्रिप्ट की बात करें तो कहानी अच्छे से बुनी गई है। सलमान की फिल्म है तो घटनाएं सारी रियलिस्टिक नहीं हो सकतीं। ऐसा ही भारत में भी हुआ है। लेकिन कसावट की बात करें तो एक बड़ी कमी ये है कि फिल्म में दो सीन ऐसे हैं जहां टेंशन और ड्रामा के अच्छे मौके बनते हैं लेकिन गानों की सिचुएशन बना दी गई है। खासकर टुर पया गाना अच्छा है लेकिन उसी की वजह से ऐसा लगता है जैसे गानों के जरिए फिल्म चल रही हो।

फिल्म में किरदारों के बीच टकराव नहीं दिखाए गए हैं। भारत को कुमुद बड़ी आसानी से मिल जाती है। बला की खूबसूरत कुमुद पर किसी और की बुरी नजर ही नहीं है। जैसे भारत के अलावा बाकी दुनिया मर्दहीन हो गई हो। और बिना मां—बाप के अपने बूते अपनी पहचान और करियर बनाने वाली कुमुद सबकुछ जानते हुए अपना करियर छोड़कर भारत की मां और दुकान ‘हिंद राशन स्टोर’ की सेवा में चली जाती है।

सलमान फिल्म में जिस मर्द की पहचान रखते हैं और जिस फैमिली वैल्यू को पेश करते हैं, शायद यह उसकी जरूरत है। यही वजह है कि भारत और कुमुद के लिव-इन के बावजूद लिव-इन की जटिलताओं को फैमिली वैल्यू की मीठी चाशनी से बदल दिया गया है।

 

फिल्म में मार—धाड़ न होने के कारण सलमान का एक्शन नहीं के बराबर है। फिल्म में एक गोली तक नहीं चली है। फिल्म में एक्शन सीन तब आता है जब सत्तर साल के भारत को मारने बाइक सवार कई गुंडे आते हैं। और वहां सलमान का स्टाइल दिखता है।

फिल्म के डायलॉग बहुत अच्छे हैं। याद करके दुहराने लायक नहीं, लेकिन परदे पर किरदारों को उभारने, कहानी को आगे बढ़ाने और कॉमेडी पैदा करने में वे कामयाब हैं। मिसाल के तौर पर जब नौकरी की लाइन में लगा भारत कहता है— ‘अरब में तेल निकला है।’ तो कुमुद कहती है— ‘सर पे लगाओगे?’ अरब में मजदूरों को घटिया खाना मिलने पर भारत कंपनी के मैनेजर को अच्छी दलील देता है— ‘मशीन में तेल जाएगा तो मशीन अच्छे से काम करेगी।’

फिल्म में गाने कई हैं और अच्छे हैं। लेकिन सलमान की पिछली सुपरहिट फिल्मों जितने अच्छे नहीं। राहेत फतेह अली खान ने उनकी कई फिल्मों में अपनी आवाज का जादू ​बिखेरा है। इस फिल्म में उनकी कमी खलती है। टुर पया, चाशनी आदि सुनने लायक गाने हैं।

दो और बातें कहकर यह रिव्यू खत्म करूंगा। एक, अमिताभ बच्चन को फिल्म ने बहुत दिल से याद किया है। उनके गानों पर डांस का एक दिलचस्प सीन है। दूसरा, शाहरुख खान को भी बहुत पॉजिटिव रूप में याद किया गया है। 1990 के दौर को बताते हुए कहा गया है— इस दौर ने देश को दो सुपरस्टार दिए— शाहरुख खान और सचिन तेंदुलकर। एक और बात, सर्कस के पुराने दौर को परदे पर जिंदा करने की छोटी लेकिन सार्थक कोशिश की गई है।

कुल मिलाकर फिल्म में देखने—सुनने लायक बहुत—सी चीजें हैं और यह फिल्म सलमान के फैंस के प्यार की बदौलत चलेगी।

 

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