डिजायनर ड्रेसेस से करन जौहर अभिभूत रहे हैं। अधिकतर मौकों पे वे खुद डिजायनर ड्रेसेस ही पहनते हैं। भव्यता उन्हें बहुत आकर्षित करती है, जिसका गहरा असर उनकी फिल्मों पर दिखाई देता रहा है। इसके अलावा प्रेम—संबंधों में जटिलता को लेकर भी उनमें एक आॅब्सेसन रहा है।

अपने पोस्टर, गानों और ट्रेलर से दर्शकों में गहरी उत्सुकता जगा चुकी ‘कलंक’ के डायरेक्टर अभिषेक वर्मन हैं लेकिन निर्माता करन जौहर की छाप पूरी फिल्म पर दिखाई देती है। कॉस्ट्यूम डिजायनर भी करन जौहर के दोस्त और फेवरेट डिजायनर मनीष मलहोत्रा हैं। करन जौहर ने पहले ही कहा है, ये फिल्म उनके दिल के बेहद करीब है और बहुत समय से वो ये फिल्म बनाना चाहते थे।

​कलंक को पीरियड ड्रामा कहा गया था। फिल्म में 1946—47 की कहानी दिखाई गई है। जगह है लाहौर,वहां का फेमस तवायफों का इलाका लोहामंडी (असली है हीरामंडी) और लाहौर के भीतर बसा हुस्नाबाद। लेकिन क्या यह एक पीरियड ड्रामा बन पाया है? हम यह आगे देखेंगे।

फिल्म में दो तरह के जटिल रिश्तों की टकराहट दिखाई गई है। बाप और बेटे के बीच खामोशी और इंतकाम का रिश्ता और पति और पत्नी के बीच दूरी का रिश्ता, पत्नी की उपेक्षा और इसी वजह से पत्नी का घर और रिश्तों की दहलीज लांघकर कलंक के दायरे में कदम बढ़ाना यानी एक साथ विद्रोह और अपनी चाहत का ऐलान।

यह सब्जेक्ट नया नहीं है। लेकिन इसके दो प्लॉट हैं और उन्हें एक प्लॉट में लाकर इसे एक नया ट्रीटमेंट देने की कोशिश की गई है। हिंदी और भारतीय सिनेमा में कुछ क्लैसिक और कुछ कमजोर फिल्में भी इस सब्जेक्ट पर बन चुकी हैं। सत्यजित रे की क्लैसिक फिल्म ‘चारूलता’ में अपने काम में व्यस्त पति की उपेक्षा के कारण अकेलेपन से जूझ रही चारूलता दूसरे पुरूष से नजदीकी महसूस करती है। गुरूदत्त की ‘साहिब बीवी और गुलाम’ में भी मीना कुमारी का किरदार रिश्तों की ऐसी ही जटिलता और अपने ढंग का विद्रोह पेश करता है। बाप से बेटे के इंतकाम के प्लॉट पर अमिताभ और संजीव कुमार की ‘त्रिशूल’ एक याद रखी जाने लायक फिल्म है।

जायज और नाजायज रिश्तों के भंवर में ‘कलंक’ दर्शकों को ले जाती है। और दर्शकों को अपना फैसला रखने को आजाद छोड़ देती है। बाप-बेटे और पति-पत्नी के जटिल रिश्तों के बीच माधुरी दीक्षित का किरदार बहार बेगम भी एक अहम किरदार है जो दोनों रिश्तों को बचाने की को​शिश करती एक असहाय सूत्रधार की सी भूमिका निभाती है, क्योंकि अपनी कोशिश में वो नाकामयाब रहती है।

एक्टिंग की बात करें, तो चौधरी बलराज के रोल में संजय दत्त अच्छे लगे हैं। अपनी गलती का अहसास, कर्तव्य भावना और गरिमा की डोरियों को उन्होंने संतुलित ढंग से थामे रखा है। माधुरी दीक्षित ने मशहूर तवायफ और एक तथाकथित नाजायज संतान की मां बहार बेगम के किरदार को बखूबी निभाया है। वो आज भी ख़ूबसूरती की बुलंद हवेली लगती हैं। और सबसे बढ़कर उनका अद्भुत डांस ख़बसूरत गानों पर उनकी भाव-भंगिमाएं। क्या कहने!

आलिया भट्ट, वरूण धवन और सिद्धार्थ रॉय कपूर तीनों अच्छे एक्टर हैं। और तीनों ने अपना सौ परसेंट देने की कोशिश की है। इनमें आलिया भट्ट ने बाज़ी ज़्यादा मारी है। न्यूजपेपर पब्लिशर और एडिटर देव (सिद्धार्थ रॉय कपूर) की दूसरी पत्नी के अतृप्त किरदार को उन्होंने मजबूती से पेश किया है।

वरूण धवन ने इंतकाम की आग में जल रहे दुस्साहसी युवक जफर के किरदार को अच्छे से निभाया है। लेकिन एक एक्टर के तौर पर उनकी सीमाएं भी दिख जाती हैं। अपनी एक्टिंग से इस किरदार को वे नया आयाम नहीं दे पाते। इस किरदार में जितना अंतर्द्वंद्व होना चाहिए था, उस अंतर्द्वंद्व पर बुलडोजर चल गया दिखता है।

एक शरीफ इंसान, अपनी पहली पत्नी के प्रति वफादार और एक सफल बिजनेसमैन देव का जो किरदार सिद्धार्थ को मिला उसे पूरे परफेक्शन से उन्होंने निभाया। उनकी एक्टिंग फाइन रही है। कैंसर की मरीज देव की पहली पत्नी सत्या के छोटे से रोल में सोनाक्षी की भी एक्टिंग ठीक रही है। कियारा अडवानी सिर्फ एक सीन में ठीक से नजर आईं लेकिन उनके हिस्से सिर्फ एक डायलॉग रहा इसलिए कुछ कहना बेकार है।

अब बात करें फिल्म की खामियों पर, जो एक अच्छी फिल्म के पैमानों पर देखें तो खूबियों से ज्यादा असरदार हैं। फिल्म के स्क्रीनप्ले में कोई कमी नहीं लगती लेकिन इरादों में गहराई नहीं है। और यही वजह है कि अधिकतर किरदार इकहरे से दिखाई देते हैं। आप उनके दर्द, उनकी पीड़ा, उनके संघर्ष से जुड़ नहीं पाते।

जफर इंतकाम की आग में जल रहा है। लेकिन किन जिल्लतों के कारण वह इंतकाम लेना चाहता है, इसका कोई इशारा तक फिल्म में नहीं है। फिल्म में वह गठीले बदन वाला बेहद पॉपुलर नौजवान है और जब एक मशहूर खेल के दौरान एक खतरनाक सांड़ से वह भिड़ता है तो उसके हजारों चाहने वालों का शोर उसकी हौसलाअफजाई करता है। लड़कियां उस पर मरती हैं। वह कितनी लड़कियों के साथ सोया है, यह पूछे जाने पर वह कहता है— इतनी गिनती ना आती मुझे।

वह चौधरी खानदान की बहू को हासिल कर चौधरी खानदान को बरबाद कर देना चाहता है। वह अपने दोस्त अब्दुल (कुनाल खेमू) को दंगों के लिए तैयार करता है ताकि उन दंगों की आग में चौधरी खानदान को फंसाकर अपना बदला ले सके। यह जफर के इश्क की कहानी नहीं है। जो अंत में दिखाने की कोशिश की गई है।

क्या यह रूप के इश्क की कहानी है? रूप को देव से पत्नी का दर्जा नहीं मिलता। वह संगीत सीखने तवायफ के कोठे पर जाती है। लौटते वक्त जब पहली बार जफर उसे मिलता है तो वह उसे कहता है— सारी तवायफों को सुना है लेकिन आपकी आवाज में दर्द नहीं इश्क है। पहली मुलाकात में ही वह जफर को जमकर बोलने देती है। चेहरे पर नाराजगी है लेकिन लौटते हुए पलटकर देखती है।

दो पल की पहली मुलाकात में जफर का डायलॉग है— ‘अपनी आंखों की कशिश को अपनी पलकों के ऐतराज से छुपाने की कोशिश ना करें।’

शायद रूप जफर के इस डायलॉग से इंप्रेस है! लेकिन लोहामंडी में अनसुनी कहानियों की तलाश में आई रूप की जब दूसरी मुुलाकात जफर से होती है तो उसका डायलॉग है— ‘मैं आपके अधूरे अरमान पूरे कर सकता हूं।’ डायलॉग का ऐसा नंगापन अगर इश्क है और अगर कोई स्त्री अपने लिए इसे इश्क समझे तो हम ज्यादा दाद डायरेक्टर की ही देंगे।

बहार बेगम जब रूप को समझाती है— आपके पति अच्छे इंसान हैं, तो रूप कहती है— ‘सिर्फ अच्छाई से जिंदगी नहीं चलती।’ यह उसका एक सच्चा बयान है। लेकिन इसे मनोवैज्ञानिक गहराई देने में डायरेक्टर की कोई दिलचस्पी नहीं। वह जफर और रूप के बीच देह का रिश्ता भी नहीं दिखाना चाहता और जफर के नंगे बयानों के बावजूद रूप को यह भरोसा करते दिखाता है कि जफर को उससे इश्क है। बहार बेगम रूप से कहती है कि जफर को सिर्फ अपने इंतकाम से मोहब्बत है तो उसका दिल टूट जाता है और वह जफर से मुंह फेर लेती है। आखिर रूप के इश्क की गहराई क्या है? फिल्म के क्लाइमेक्स में इश्क की गहराई दिखाने की कोशिश की गई है लेकिन आप इन सवालों से पीछा नहीं छुड़ा पाते?

फिल्म की दूसरी बड़ी खामी है डायलॉग। इतने ज्यादा डायलॉग रखे गए हैं और वो भी इतने थिएट्रिकल और शायराना कि लगता है, कोई फिल्म नहीं,  मेलोड्रामा नाटक या टीवी सीरियल देख रहे हों। डायलॉग्स पे डायलॉग्स। एक डायलॉग बोले जाने पर आप मानकर चलने लगते हैं कि दूसरा किरदार भी उससे मैच करता हुआ डायलॉग बोलेगा ही। जो बात चेहरे की खामोशी से कही जानी चाहिए, बॉडी लैंगुएज से कही जानी चाहिए, सिचुएशन या विजुअल्स से कहनी चाहिए वो भी हर किरदार डायलॉग से कह रहा है। अगर डायलॉग्स से इतना इश्क नहीं किया जाता तो जफर और देव के किरदार को थोड़ी गहराई मिल जाती।

फिल्म का आशिक जफर एक बार गुस्से में अपने बायोलॉजिकल पिता की गरदन पकड़ता है, और एक बार अपनी अम्मी की गरदन पकड़ता है। अगर इतनी मनोवैज्ञानिक गहराई से  फिल्म बनाई गई है तो समीक्षक बेचारा क्या करे?
फिल्म में तीन बार माफी मांगी गई है। एक बार बाप बेटे से माफी मांगता है। एक बार पति पत्नी से माफी मांगता है और एक बार जफर रूप से माफी मांगता है। डायलॉग बोलकर माफी मांगने का यह अंदाज भी काबिलेतारीफ है! समीक्षक क्यों कहे कि क्या सब माफी मांगने की फॉरमैलिटी अदा कर रहे हैं? क्या करन जौहर को भी एक बार माफी नहीं मांग लेनी चाहिए? किरदार के अपराधबोध को, गलती के गहरे अहसास को चेहरा ना बोले, आपकी बॉडी लैंगुएज ना बोले तो एक्टिंग फिर किस चिड़िया का नाम है? जबकि आपने सब अच्छे एक्टर्स लिए हैं।

फिल्म पीरियड ड्रामा नहीं है। लाहौर की कोई भी ऐतिहासिक हवेली, मंदिर, मजार, गुरूद्वारा, उस वक्त का कोई रेफरेंस फिल्म में नहीं है। सिर्फ बंटवारे के वक्त के दंगे से इसे पीरियड ड्रामा किसी को कहना हो तो कोई रोक नहीं सकता। तवायफ के कोठे में जो फानूस दिखाए गए हैं, सड़क पर चल रही रामलीला के सीन को भव्यता देने के लिए जो आधुनिक तकनीक और क्रेन की मदद ली गई है वो पीरियड ड्रामा पर भव्यता या ग्रैंड विजुअल्स दिखाने की चाहत की जीत है।

अपने शानदार कोठे पर बहार बेगम गा रही है, पचासों और डांसर्स के साथ शानदार डांस कर रही है, बहार बेगम के अलावा सब की सब एक रंग के यूनिफॉर्म में सजी हुई हैं। लेकिन कोठे पर वाह-वाह करने वाला एक भी श्रोता-दर्शक नहीं है। आप चाहें तो इस पर इंप्रेस हो सकते हैं। आप चाहें तो इस पर हंस भी सकते हैं।

तबाह हो गए गाने में भी अलग रंग की ड्रेस के साथ यही दुहराया गया है। गाने के समय बारिश हो रही है और बाहर सारी छतरियां भी लाल रंग की हैं। हद तो यह है कि सारे दंगाई भी जब दंगा करने निकलते हैं तो सब एक रंग के कपड़े पहने हुए हैं।

पूरी फिल्म शानदार विजुअल्स से भरी है। मनमोहक। सिनेमटोग्राफी और विजुअल इफेक्ट्स कमाल के हैं। प्रीतम का अब तक का शायद सर्वश्रेष्ठ म्यूजिक है। श्रेया घोषाल की दिल छूने वाली गायकी है। गीत बेहद सुंदर हैं। सरोज खान के डायरेक्शन में माधुरी दीक्षित का अद्भुत डांस है। एक काव्यात्मक प्रभाव रचने की कोशिश है। यह सब बहुत लोगों को पसंद आएगा।

लेकिन विजुअल्स के लिए कंटेंट से समझौता करने के कारण कलंक एक बड़े मौके से बुरी तरह चूक गई है।

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