कुछ किरदार जीने के लिए और जीने के लायक नहीं होते। लेकिन उनकी कहानियां दिलचस्प होती हैं। कबीर सिंह ऐसी ही फिल्म है। ये तो आपको ट्रेलर से ही पता चल गया होगा कि फिल्म में लीड किरदार कबीर सिंह की गर्लफ्रेंड की शादी हो जाती है और उसके बाद हीरो खुद को मिटाने के रास्ते पर चल पड़ता है। क्या फिल्म इसी ट्रैक पर चलती है और ऐसा होने को फिल्म जस्टिफाई कर पाती है, आइए जानते हैं।

कबीर सिंह दिल्ली के एक नामी मेडिकल कॉलेज में टॉपर स्टुडेंट है। लेकिन उसकी एक प्रॉब्लम है, जब उसे गुस्सा आता है, तो वो किसी को कुछ नहीं समझता। जिसकी कुटाई करनी होती है, उसकी नाक-मुंह सब तोड़ डालता है। उससे सब डरते हैं।

उसकी ऐसी ही एक हरकत पर प्रिंसिपल एक महीने के लिए उसे सस्पेंड कर देते हैं लेकिन अपना हीरो बैच का सबसे टैलेंटेड स्टुडेंट है। लिहाजा प्रिंसिपल कबीर सिंह को पसंद करते हैं। उलटे कबीर सिंह कॉलेज छोड़ देने का फैसला करता है कि तभी उसकी नजर मेडिकल फर्स्ट ईयर में आई प्रीति पर पड़ती है और वह ऐलान कर देता है कि वो उसकी बंदी है। उसके अलावा जिसको जो बंदी चाहिए ले ले। और इस बंदी को वह क्लास छुड़वाकर जहां मर्जी वहां बाइक पर बिठाकर घुमाता है, किस करता है, स्मूच करता है और फिर वापस लाकर छोड़ देता है।

उसे उसकी पढ़ाई की भी परवाह है। इसलिए क्लास से हुए नुकसान की भरपाई खुद उसे पढ़ाकर करता है।

उसकी तबियत खराब होने पर गर्ल्स हॉस्टल से उसे निकालकर ब्यॉयज़ हॉस्टल के अपने कमरे में रखता है। रूल्स क्या कहते हैं, दूसरे क्या सोचेंगे, ये उसकी प्रॉब्लम नहीं है। प्रीति भी उसे प्यार करने लगती है और उनके बीच सबकुछ हो जाता है।

जब कोर्स पूरा होने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए कबीर मसूरी जाता है तो प्रीति भागी हुई उसके पास आ जाती है। अब ये प्यार दोतरफा है। लेकिन बात जब शादी की आती है और प्रीति की फैमिली को पता चलता है तो वे प्रीति और कबीर सिंह पर आगबबूला हो जाते हैं।

अब बात बिगड़ जाती है क्योंकि कबीर सिंह को लगता है कि अपनी फैमिली के सामने प्रीति खुलकर नहीं आई। कबीर इसी गुस्से में जमकर शराब पीता है, नशे का इंजेक्शन लेता है। और उधर प्रीति की शादी किसी और से हो जाती है।

यहां से दोनों की राहें बदल जाती हैं, क्या वे दोनों मिल पाएंगे, क्या नशे की बुरी लत से कबीर सिंह बाहर निकल पाएगा, ये सब जानने के लिए तो फिल्म देखनी पड़ेगी।

फिल्म बॉलीवुड की लव स्टोरीज़ से बहुत हटकर है। यह तेलगू फिल्म ‘अर्जुन रेड्डी’ की रीमेक है। डायरेक्टर भी वही हैं-संदीप रेड्डी वांगा।

हीरो को बहुत आक्रामक दिखाया गया है। जिसका अपने उपर भी काबू नहीं। ख़ूबसूरत लड़की को वह बंदी समझता है। और लड़की भी कोई ऐतराज नहीं करती। बहुत लोगों को ये एटिट्यूड कूल लगेगा, लेकिन सोच-समझ रखने वालों को यह खलेगा। आखिर लड़की उसके सामने समर्पण क्यों करती है, क्यों कॉलेज में सभी उससे डरते हैं, और कई लड़के-लड़कियां उसे क्यों पसंद करते हैं, इसकी कोई वजह पता नहीं चलती।

फिल्म में एक वक्त आप गिनना छोड़ देते हैं लेकिन बीस के आस-पास तो स्मूचिंग-किसिंग सीन होंगे ही। अपनी महबूबा से बिछुड़ने के बाद अपने हीरो को शराब से ऐसी मोहब्बत होती है कि उसके घर में आपको पब के दर्शन मिलेंगे। हिंदी फिल्मों में पहली बार हीरो को बीस गिलास दारू पीते दिखाया गया है।

फिल्म एंटरटेनिंग है। कबीर सिंह के रोल में शाहिद ने छप्परफाड़ एक्टिंग की है। प्रीति के रोल में कियारा अडवानी ने अपने कॅरियर का बेस्ट परफॉर्मेंस दिया है। खूबसूरत तो वो हैं ही। उनमें पुराने वक्त की हेमा मालिनी का अक्स दिखाई देता है। कबीर सिंह के भाई के रोल में अर्जन बाजवा ने और कबीर के दोस्त के रोल में सोहन मजूमदार ने जो एक्टिंग की है, उसने भी फिल्म को देखने लायक बनाया है। कबीर के पिता के रोल में सुरेश ओबेराय ने जान डाल दी है। अपने कॅरियर के 73 साल पूरे कर रही कामिनी कौशल ने कबीर सिंह की दादी के रोल में इमोशन और एंटरटेनमेंट का जबरदस्त तड़का लगाया है।

फिल्म के लगभग सारे गाने अच्छे हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक ने तनाव को गहरा करने और मूड्स को चेंज करने में अहम रोल अदा किया है। सिनेमटोग्राफी को सौ में सौ नंबर दिए जा सकते हैं। खासकर क्लोजअप शॉट्स इंप्रेसिव हैं। इससे कबीर सिंह के गुस्से, चिड़चिडेपन और डिप्रेशन को दिखाने में कामयाबी मिली है। हालांकि डायरेक्टर ने इसका कोई साइकोलॉजिकल जस्टिंफिकेशन दिया होता तो ये मन पर स्थायी असर डालता।

कुल मिलाकर कबीर सिंह को नफरत करते हुए प्यार करना हो तो फिल्म देख सकते हैं। लेकिन हमारी मुफ्त की सलाह है कि सावधानी की पुड़िया साथ लेकर चलें। फिल्म की सेंसिटिविटी तेलगू मसाला फिल्मों वाली है जहां मर्द सिर्फ मर्द होता है। उसके अंदर कोई औरत नहीं जागती। उसकी चॉयस, उसकी मर्जी, उसका फैसला आखिरी होता है।

इतना एटिट्यूड, इतना गुस्सा, इतनी शराब, इतनी सिगरेट सेहत के लिए हानिकारक है। और फिर रिश्ते सबको हमेशा थाली में सजाकर नहीं मिलते।

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