इस फिल्म में कुछ प्रयोग है, कुछ ट्रेंड। लेकिन ट्रेंड को नया टच दिया गया है।

यह फिल्म 2008 से 2010 के बीच सिलसिलेवार हुए आतंकवादी बम विस्फोटों के बैकग्राउंड पर आधारित है। और इसके मास्टरमाइंड को पकड़ने के खुफिया ऑपरेशन की कहानी है। ऐसी कहानी पहले भी कही गई है। लेकिन इसमें खास यह है कि कोई धायं-धायं नहीं, कोई हीरोगिरी नहीं, कोई स्टंट नहीं, फिर भी आतंकवादी को धर दबोचा गया है।

यह फिल्म आईबी के अफसर और उनके सुराग कैसे काम करते हैं, उसे दिखाने का काम करती है। प्रभात कपूर (अर्जुन कपूर) आईबी अफसर है जिसने जोखिम लेकर कई केस सफलता से अंजाम दिए हैं। सिर्फ अपने नेटवर्क, अपने हौसले और अपनी समझदारी के बल पर। और इसमें उसका साथ देते हैं बिहार पुलिस के बड़े अधिकारी सिंह साहब (राजेश शर्मा) क्योंकि उन्हें उस पर यकीन है। उसकी इंफॉर्मेशन पर भरोसा करके ऑर्डर पास कराना, सिक्यूरिटी बैकअप दिलाना उनका काम है।

और बिहार के कुछ मामूली दिखने वाले गैर मामूली लोग, जो जान जोखिम में डालकर प्रभात के साथ हर ऑपरेशन में काम करते हैं। उनके घरवालों को भनक तक नहीं है, कि ऐसे खतरनाक ऑपरेशन के लिए वो काम करते हैं। और वो भी तब, जब ”पिछला वाला ऑपरेशन का अभी पैसा नहीं मिला है। कौन सा नौकरी है जिसमें उलटा पैसा देना पड़ता है।”

एक किरदार कहता है- ”मां ऐसे तो कभी मछली पकड़ने नहीं जाने दी। कहेंगे टेररिस्ट पकड़ने जा रहे हैं, तो जाने देती?”

तो फिल्म जिस ऑपरेशन पर बेस्ड है वो है भारत के ओसामा बिन लादेन कहे जाने वाले आतंकवादी युसूफ को पकड़ना। पिछली कई आतंकवादी वारदातों का वो मास्टरमाइंड है जिसमें सैकड़ों मासूमों की जान गई है। इंडिया के इस मोस्ट वांटेड का सुराग मिलता है प्रभात को। जिस नेटवर्क से सुराग मिलता है उस पर भरोसा किया जा सकता है। वो प्रभात का आजमाया हुआ नेटवर्क है। लेकिन जिसने फोन करके सुराग होने का दावा किया है, उससे प्रभात कभी नहीं मिला है।

डबल क्रॉस भी हो सकता है। लेकिन भरोसा उसी पर करके आगे बढ़ना है। प्रभात और उसकी टीम इसी शक और भरोसे के साथ ऑपरेशन को अंजाम देने के अंतिम मोड़ पर हैं। बिहार से नेपाल और नेपाल की पहाड़ियों, गलियों, कस्बों की यात्रा कराई गई है ताकि मोस्ट वांटेड के ठिकाने तक पहुंचा जा सके।

इस ​टीम के लिए मुसीबत तब और बढ़ जाती है जब सिंह साहब के भरोसा दिलाने पर भी दिल्ली से सिक्यूरिटी बैकअप नहीं मिलता। उनका सवाल है, अगर सुराग गलत निकला तो क्या होगा? नेपाल के साथ रिलेशन ठीक नहीं चल रहे, वहां अभी इलेक्शन टाइम है। हम रिस्क नहीं ले सकते। तो इस तरह पेपर पर इस ऑपरेशन का कोई अस्तित्व नहीं है। मरे तो साबित भी नहीं किया जा सकता कि क्यों मरे। और उनके परिवारवालों को कुछ नहीं मिलने वाला। इसलिए प्रभात कहता है- हमारे देश को ज्यादा खतरा दिल्ली में बैठे लोगों से है।

इन हालात में इस ऑपरेशन को अंजाम दिया गया है और कामयाबी हासिल की गई है तो आप समझ सकते हैं, फिल्म किस तरह के तनावों से गुजरती है।

फिल्म की स्क्रिप्ट कमाल की है। फिल्म में प्रभात का प्रोफाइल बहुत सिंपल रखा गया है। कोई रौब-रुतबा नहीं। इस कारण सारा दारोमदार एक्टिंग पर आ जाता है। और प्रभात कपूर को अपनी सहज एक्टिंग से अर्जुन कपूर ने साकार किया है। राजेश शर्मा ने हर बार की तरह असरदार एक्टिंग का जलवा दिखाया है। लेकिन अलग से बात करनी हो तो जलवा तो देखते बनता है, मामूली दिखनेवाले गैरमामूली कलाकारों का जो अर्जुन कपूर का पूरी फिल्म में शानदार साथ देते हैं। इनके चेहरे अनजान हैं लेकिन गुमनाम होकर काम करने वाले किरदारों को परदे पर जीकर इन्होंने दिल जीता है।

फिल्म की सिनेमटोग्रफी बहुत अच्छी है। सिर्फ नेपाल की वादियों की खूबसूरती पर ही कैमरा नहीं जाता, बल्कि नेपाल की बस्तियों, बाजारों, गलियों को भी बहुत प्रामाणिक ढंग से दर्ज करता है। शूटिंग के लिए ये सबसे मुश्किल जगहें होती हैं।

राजकुमार गुप्ता ने स्क्रिप्ट​ और डायरेक्शन दोनों में बाजी जीती है। इंडियन मुजाहि​दीन के आतंकवादी यासीन भटकल को दिल्ली पुलिस ने पिछले साल, जनवरी 2018 में बिना किसी का खून बहाए गिरफ्तार करने में कामयाबी हासिल की थी। इस सच्ची घटना को फिल्म की कहानी में बदलने और परदे पर साकार करने में उन्होंने कामयाबी हासिल की है।

फिल्म में कोई रोमांस नहीं है। कोई हीरोईन तक नहीं है। बस दो रोमैंटिक एसएमएस हैं, जिस पर सिंह साहब प्रभात को छेड़ते हैं। फिल्म में ज्यादा एक्शन भी नहीं है। ये दोनों बातें फिल्म की कमी कही जा भी सकती है, और नहीं भी। समझदार दर्शक इनकी कमी महसूस नहीं करेंगे, लेकिन जिन्हें एक्शन और रोमांस चाहिए, उनके लिए यह फिल्म पैसा वसूल नहीं है।

लेकिन यह डायरेक्टर की कमी नहीं है। फिल्म की जो शक्ल उसने चुनी है, उसमें इन चीजों की बहुत गुंजाइश नहीं थी। चार दिन का दिमाग और जोखिम भरा ऑपरेशन दिखाया गया है। अगर वो चीजें होतीं तो जॉन अब्राहम और सलमान खान टाईप की फिल्म हो जाती और सच्चाई के करीब रखने की उसकी कोशिश बेकार चली जाती।

फिल्म में अमित त्रिवेदी का संगीत फिल्म के सब्जेक्ट के अनुसार अच्छा है। फिल्म का गीत वंदेमातरम फिल्म के बाद भी सुना जा सकता है। हालांकि अकेले गुनगुनाने वाले गीत फिल्म में नहीं हैं।

फिल्म में एक-दो बातें खलती हैं। एक तो ये, कि ऑपरेशन जहां अंजाम दिया जाना है वहां वेपन यानी हथियार नहीं चलाना है। लेकिन क्या लोकल संपर्कों की मदद से किसी पिस्टल का इंतजाम नहीं करना चाहिए था? तब जबकि सब पर जान का खतरा मंडरा रहा था?

दूसरा, आतंकवादी युसूफ पकड़े जाने पर बहुत ज्यादा प्रतिरोध नहीं करता। ये लोग तो आत्मघाती हमलावर होते हैं। तो उसने अपनी जान लेने की कोशिश क्यों नहीं की? डायरेक्टर का क्या जवाब होगा, पता नहीं। लेकिन इसका एक जवाब शायद ये हो सकता है, कि मास्टरमाइंड आत्मघाती हमलावर तैयार करते हैं, खुद अपनी जान नहीं देते। और शायद इसीलिए यासीन भटकल पकड़ा गया या एक समय मसूद अजहर को गिरफ्तार किया गया था। इसके अलावा हकीकत में भरसक कोशिश भी यही की जाती है कि आतंकवादी को जिंदा गिरफ्तार किया जाए, जिससे उनके पूरे नेटवर्क को खत्म किया जा सके।

हम आपको यही कहेंगे कि अगर आप कुछ खास नहीं कर रहे हैं, तो यह फिल्म देख सकते हैंं।

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