सिमबा: मसाला फिल्मों की फिर वापसी

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पिछले कुछ महीनों में जब राजी, अंधाधुन, स्त्री, बधाई हो जैसी फिल्में आईं और बॉक्स ऑफिस पर हिट हुईं और कई बड़े स्टार वाली फिल्में फलाप हो गईं तो कहा जाने लगा कि अब फिल्में कंटेंट के दम पर चलती हैं, दर्शक अब मैच्योर हो गया है। लेकिन सिमबा देखकर कहा जा सकता है कि मसाला फिल्मों का दौर अभी कहीं नहीं गया और शायद यह निरंतर चलने वाला है। यह फिल्म एक बार फिर से साबित करती है कि हीरो कुछ भी कर सकता है, बशर्ते वह आम दर्शकों का मनोरंजन कर सके, दर्शकों से सीटियां बजवा सके। इसके लिए जरूरी है कि उसे अनाथ दिखाया जाए। जी हां, वैसे ही जैसे अमिताभ बच्चन को उनकी कई हिट फिल्मों में दिखाया गया और उनकी एंग्री यंगमैन की छवि बनी थी। लेकिन यहां सिमबा के अनाथ होने के कारणों को नहीं दिखाया गया है। फिल्म के पहले सीन में दिखाया गया है कि 10-12 साल का सिमबा फिल्मों की टिकट ब्लैक कर रहा है। वहां वे गुंडे आ जाते हैं जिनका टिकट ब्लैक करने के धंधे पर कब्जा है। लेकिन सिमबा उनसे नहीं डरता। वहां पड़ी कांच की बोतल तोड़कर ‘नाम’ फिल्म में बोले गए संजय दत के डायलॉग को दुहराता है यानी तुम में से जो भी पहले हाथ उठाएगा उसे मैं नहीं छोड़ूंगा। इसी दौरान वह एक पुलिसवाले को रिश्वत लेते देखता है और ठान लेता है कि वह गुंडागर्दी करके नहीं पुलिसवाला बनके पैसे कमाएगा। और फिर पूरी फिल्म उसके कारनामों से भरी है। आधी फिल्म में उसका चरित्र निगेटिव दिखाया गया है। लेकिन हंसी मजाक के अंदाज और रोमांचक एक्शन के कारण दर्शक उसके भ्रष्टाटार को भूलकर से उसके कारनामे और उसका रोमांस देखते रहते हैं। और यही रोहित शेट्टी का कमाल है।
फिल्म के बाकी किरदार उसके यानी सिमबा भालेराव के व्यक्तित्व को उभारने के लिए रखे गए हैं। जैसा कि फिल्म के हिट हो चुके गानों से दर्शकों को पहले ही पता चल चुका है, फिल्म में रोमांस भी है। सिमबा भालेराव की जिस नए पुलिस स्टेशन पर पोस्टिंग होती है वहीं पहली नजर में सिमबा हीरोईन को दिल दे बैठता है। हीरोईन एक एंकाउंटर स्पेशलिस्ट शहीद पुलिसवाले की बेटी है जो अब केटरिंग का काम करती है। हीरोईन की हां के लिए हीरो को लंबा इंतजार नहीं करना पड़ता। वह उसकी पास आने की कोशिशों से वाकिफ है और खुद ही उसे प्रपोज करने के लिए कहती है। लेकिन फिल्म जब तनाव के मोड़ों से गुजरती है तो लगभग पौन घंटे हीरोईन फिल्म से गायब रहती है। क्योंकि यह हीरो के सोलो परफॉरमेंस वाली फिल्म है। अच्चे और बुरे को लेकर हीरोईन क्या सोचती है, इससे फिल्म को कोई मतलब नहीं है। जिस सुपरहिट तमिल फिल्म टेम्पर की यह रिमेक है उसमें भी सबकुछ ऐसे ही दिखाया गया है। इस तरह निर्देशक रोहित शेट्टी ने कोई जोखिम नहीं लिया है बल्कि पहले के हिट हो चुके मसालों का ही इस्तेमाल करके एक पारंपरिक एंटरटेनिंग फिल्म बनाने की कोशिश की है। रोहित शेट्टी का यह फिल्ममेकिंग विज़न फिल्म के गानों तक में दिखाई देता है। फिल्म के दो हिट गाने ‘आंख मारे’ और ‘तेरे बिन’ पुराने हिट गानों का रिमेक हैं। फिल्म के अंत में सिंघम यानी अजय देवगन और अक्षय कुमार की एंट्री भी इसी विजन से कराई गई है। फिल्म में सिंघम की अचानक एंट्री किस तर्क से होती है यह समझ से परे है लेकिन परदे पर सिंघम की एंट्री सफल कही जाएगी क्योंकि दर्शक उसकी एंट्री का जवाब जोरदार तालियों और सीटियों से देते हैं।
फिल्म एनर्जी से भरपूर है और इस एनर्जी का सारा दारोमदार मौजूदा दौर के सबसे एनर्जेटिक एक्टर रनवीर सिंह के कंधों पर है। सिमबा भालेराव का किरदार उन्होंने पूरे जोश-खरोश, मैनरिज्म और अभिनय की बारीकियों के साथ निभाया है। हालांकि उनकी इस एक्टिंग में कोई नयापन नहीं है लेकिन सिमबा भालेराव के मैस्क्युलिन बॉडी लैंगुएज को पेश करने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी है। एक फिल्म पुरानी हीरोईन सारा अली खान अपने छोटे रोल में भी जमी हैं। केदारनाथ में वह अपनी एक्टिंग के लिए तारीफ पहले ही बटोर चुकी हैं। लेकिन हीरो सेंट्रिक इस फिल्म में उनके पास ज्यादा मौके नहीं थे। आशुतोष राणा, सोनू सूद और सिद्धार्थ जाधव की एक्टिंग का खास तौर पर जिक्र करना होगा जिन्होंने अपने रोल में एक्टिंग की चमक बिखेरी है। इनमें खास तौर पर ईमानदार हेड कॉन्सटेबल के रोल को अपनी मैच्योर एक्टिंग से आशुतोष राणा ने यादगार बना दिया है।
फिल्म में कई कमियां भी हैं। एक भ्रष्ट पुलिस अफसर सच्चा प्यार कितनी आसानी से कर लेता है इस सवाल को छोड़ भी दें तो भी एक भ्रष्ट पुलिस अफसर सिमबा भालेराव को एक ईमानदार अफसर में रूपांतरित करने के लिए जो घटना रखी गई है वह पर्सनल बदला लेने के नजरिए से तो ठीक है लेकिन पूरे व्यक्तित्व को बदल देने के नजरिए से कंविंसिंग नहीं है।
जिस बलात्कार की घटना को लेकर सिमबा का रूपांतरण कराया गया है और कोर्ट में आंकड़ों के साथ उसका लंबा भाषण रखा गया है, उसकी समस्या की गंभीरता को देखते हुए सिमबा या निर्देशक सेंसिटिव नहीं दिखाई देता। यह समस्या सिमबा को पूरे करियर में तब दिखती है जब कुछ दिन पहले उसकी मुंहबोली बहन बनी युवती के साथ बलात्कार होता है। और फिर इसकी सजा के लिए वह महिला किरदारों से जिस तरह एक-एक करके पूछता है वह बलात्कार की समस्या के प्रति पुलिस अफसर की सेंसिटिविटी और गंभीरता दिखाने के बजाय सिर्फ उसके नायकत्व को उभारने के लिए रचा गया ड्रामा और व्यक्तिगत प्रतिशोध बनकर रह जाता है। जबकि मुंहबोेली बहन बनी वही युवती जब पहली बार पुलिस स्टेशन में उससे मिलती है और छोटे बच्चों के जरिए ड्रग्स का धंधा चलने की कंप्लेन करती है और अपनी इसी मुहिम के कारण अंततः उसके साथ बलात्कार होता है और उसकी जान जाती है, तो वह कोई एक्शन नहीं लेता और बड़ी मासूमियत से सोचता है कि दूर्वा रानाडे ने अपने इस धंधे के बारे में तो उसे बताया ही नहीं। और अंत तक वह इसके लिए खुद को कसूरवार नहीं महसूस करता। कोर्टरूम का सीन भी अस्सी के दशक की जीतेंद्र की फिल्मों जैसा रखा गया है जिनमें लंबे-लंबे भाषण होते थे। लेकिन गनीमत थी कि वे भाषण वकीलों के होते थे। यहां इंस्पेक्टर सिमबा भालेराव जिस तरह बलात्कार के सरकारी आंकड़े रखते हुए जज को भाषण देता है और जज को अपना फैसला बदलने को मजबूर कर देता है उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि मसाला फिल्मों का हीरो कुछ भी कर सकता है। और यह तब है जब कोर्टरूम की बहसों को हाल की कई हिट फिल्मों में बड़े रियलिस्टिक ढंग से दिखाया गया है। कोर्ट में मंत्री की मौजूदगी और एसआईटी कैसे बिठाई जाए इस बारे में अपनी जगह बैठे-बैठे जज को सलाह देना और जज का उस पर अमल करना भी एक हास्यास्पद सीन है। लेकिन इन असंगतियों की परवाह रोहित शेट्टी को करनी नहीं थी। उन्हें दर्शकों की मनोरंजन की भूख पर पूरा भरोसा था और इसलिए उन्होंने एक पारंपरिक डांस-गाने-एक्शन-ड्रामा से भरपूर बॉलीवुड मसाला फिल्म बनाई है। और रोहित शेट्टी की पिछली सभी फिल्मों की बॉक्स ऑफिस पर छप्परतोड़ कमाई को देखते हुए कौन कह सकता है कि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कमाई नहीं करेगी!

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