एक ब्रिलिएंट स्टुडेंट गरीबी के कारण पढ़ने के लिए विदेश नहीं जा सका और शहर के एक महंगे कोचिंग सैंटर का स्टार टीचर बन कर तगड़ी कमाई करने लगा। एक दिन अपनी ही तरह के एक ब्रिलिएंट मगर गरीब स्टुडेंट को देखकर उसकी आंखें खुलीं और उसने 30 गरीब ब्रिलिएंट स्टुडेंट्स को चुनकर उन्हें इंजीनियरिंग के एंट्रेंस एग्जाम की तैयारी करवानी शुरू कर दी, अपने खर्चे पर। इस तरह से साल-दर-साल यह टीचर ऐसे 30 बच्चों के खाने-पीने, रहने-पढ़ने का खर्चा उठाता रहा और उनमें से ज्यादातर को आई.आई.टी. जैसे संस्थानों में पहुंचाता रहा। इस टीचर के रास्ते में तमाम मुश्किलें आईं लेकिन इसने हार नहीं मानी और एक दिन पूरी दुनिया ने इसे इज़्ज़त दी।

 

यह कहानी है बिहार के गणितज्ञ टीचर आनंद कुमार की। इसी से ‘प्रेरित’ होकर बनी है ‘सुपर 30’। लेकिन इसे जान-बूझ कर ‘फिल्मी’ बनाया गया है और इसका यह ‘फिल्मीपन’ इसकी गहराई की हत्या कर देता है। इसे एक ऐसी फिल्म का दर्जा नहीं दे पाता जो दर्शकों और फिल्मकारों के लिए एक मिसाल बन जाए और बरसों तक उनके दिलों में बैठ जाए।

फिल्म का आनंद कुमार पिता की मौत के बाद सड़कों पर घूम-घूम कर अपनी मां के बनाए पापड़ बेचता है। कहते हैं कि असली आनंद कुमार ने भी पापड़ बेचे थे। हालांकि तार्किक मन पूछता है कि घर में दो-दो मुस्टंडे नौजवान थे तो यह नौबत ही क्यों आई? सरकारी कर्मचारी रहे पिता की पेंशन भी तो आती होगी भाई? और वैसे भी कोई भी पढ़ा-लिखा नौजवान आड़े वक्त में सबसे पहले अपनी एजुकेशन को ही हथियार बनाता है, नौकरी तलाशता है, गली-पड़ोस में ट्यूशन पढ़ाता है। खैर…!

लल्लन जी के कोचिंग सैंटर में पढ़ाते हुए ‘आंखे खुलने’ के बाद आनंद कुमार का सब छोड़ कर संत और क्रांतिकारी बन जाना दिल को भले ही अच्छा लगता हो, दिमाग को नहीं जमता। तार्किक मन पूछता है – आनंद कुमार, एकदम से सब को लात काहे मार दिए बे…! इन बच्चों पर हो रहे खर्चे के लिए दिन में चार ठौ घंटा लल्लन के यहां पढ़ा दिए होते तो वो भी खुस्स होता, वहां पढ़ रहे अमीर बच्चे भी और इधर ये 30 मेधावी गरीब बालक भी। तब न उनकी राह में वे मुश्किलें आतीं जो फिल्म दिखाती है और अमीर-गरीब, सब जाकर एंट्रेंस एग्जाम देते, जिसमें ज्यादा टैलेंट होता, वो जीत जाता।

फिल्म में एक सीन है भी जब एक अमीर बच्चा आनंद कुमार से पूछता है कि सर, इसमें हमारा क्या कसूर है जो हम अमीर परिवार में पैदा हुए? न आनंद कुमार कोई जवाब देते हैं, न ही यह फिल्म। दरअसल यही इस फिल्म की सबसे बड़ी कमी है कि यह बराबरी की बात करती है, वर्ग-संघर्ष की बात करती है लेकिन उसे कायदे से उकेर-दिखा नहीं पाती। साथ ही यह कहती तो नहीं, लेकिन इसके डायलॉग्स की टोन कुछ ऐसी है कि हर अमीर ऊंची जाति का होता है और हर गरीब दलित। विपरीत हालात से जूझते-भिड़ते एक अंडरडॉग और उसके 30 बच्चों के संघर्ष को यह बहुत ही सतही नज़र से देखती है। संत कबीर की वाणी में बोलें तो ‘गहरे पानी में पैठने’ का जोखिम नहीं उठाती!

विपरीत हालात भी बिलकुल फिल्मी दिखाए गए हैं। आनंद को अपनी फैमिली की कोई फिक्र ही नहीं, खुद की कोई परवाह नहीं। बस, बच्चों के लिए तीन महीने का राशन मिल जाए। और वह मिला भी कैसे, फिल्म ने दिखाया मगर बताया नहीं। न एजुकेशन सिस्टम पर कोई टिप्पणी, न उस सामाजिक-व्यवस्था की बात, जिसने समाज के कुछ तबकों को बराबरी के अवसर नहीं दिए। और गौर करें तो एक तरह से यह फिल्म कोचिंग के उस जंजाल का भी सपोर्ट करती नज़र आती है जिसे लेकर हमारा समाज अक्सर चिंताएं प्रकट करता रहा है। एक सीन में आनंद कुमार एक स्टुडेंट से पूछते हैं-‘इतना गलत कैसे हो सकते हो भाई? फिल्म देखते हुए मन होता है कि इसे बनाने वालों से पूछा जाए कि गणित जैसी दुनिया की सबसे तार्किक चीज पर फिल्म बनाते समय इतना अतार्किक कैसे हो सकते हो भाई?

इंटरवल तक फिल्म की स्क्रिप्ट शानदार है। लगता है कि यह एक वास्तविक हीरो की कहानी को वास्तविकता के कलेवर में दिखा रही है और आगे चल कर यह हमारे भीतर जोश और जज़्बा ला सकेगी। लेकिन बाद में यह फैलने लगती है। वास्तविक मुश्किलों के फिल्मी हल दिखाती है और फिल्मी किस्म की मुश्किलों में उलझने लग जाती है। अंग्रेज़ी में गाने या गुंडों के हमले वाले सीक्वेंस ‘बॉलीवु​डियन’ लगते हैं। कोचिंग चलाने वाला लल्लन इतना बौखलाया हुआ क्यों है जबकि आनंद की फ्री-कोचिंग से उसके बिज़नेस पर न तो कोई असर पड़ सकता है और न ही अभी तक आनंद के पढ़ाए बच्चों का पहला बैच निकल कर आया है? और क्या पूरे पटना शहर में एक ही काबिल टीचर है? यह तो बिहार की प्रतिभा का अपमान हो गया भाई! फिल्म के ‘कुछ’ डायलॉग्स में जान है।

कुछ एक जगह प्रतीकों और बिंबों का अच्छा इस्तेमाल है। आनंद के पिता साईकिल की चेन उतर जाने पर दो पैडल पीछे की तरफ मारते हैं तो चेन चढ़ जाती है। ज़िंदगी भी ऐसी ही है, अटको तो थोड़ा पीछे आ जाओ, फिर आगे बढ़ो। आनंद यही करता है।

फिल्म के लुक के साथ काफी दिक्कत है। पर्दे पर हर समय मटमैली रंगत देख कर लगता है कि सत्तर के दशक में पहुंच गए हैं। नब्बे का दशक इतना भी बदरंग नहीं था भाई। बच्चों के कपड़े आदि देखकर लगता है कि वे गरीब हैं लेकिन आनंद कुमार को देखकर लगता है कि उसके पास नहाने तक के पैसे नहीं हैं। लहज़े की कमियों के बावजूद इस किरदार को पकड़ने में की गई हृतिक रोशन की मेहनत दिखती है। मृणाल ठाकुर प्यारी लगती हैं।

पंकज त्रिपाठी हर बार की तरह जंचते हैं, हंसाते हैं और अपने हल्के किरदार को भी इंप्रोवाइज़ करके ऊंचाई पर ला देते हैं। अमित साध को फिल्म बेवजह हर वक्त एटिट्यूट में दिखाती है।

 

आदित्य श्रीवास्तव, वीरेंद्र सक्सेना, नंदिश सिंह, परितोष संड, मानव गोहिल, अली हाजी और बच्चों के किरदारों को निभाने वाले सभी कलाकारों का काम उम्दा रहा है। कैमरावर्क साधारण है, सैट्स भी। संगीत में रेट्रो टच है, ‘करीब’ फिल्म के संगीत का स्मूथ टच भी। बैकग्राउंड म्यूज़िक असरदार है। फिल्म काफी लंबी है और यह लंबाई कई जगह काटी जा सकती थी।

पिछले बरस ‘मीटू’ वाले आरोप के बाद डायरेक्टर विकास बहल को यह फिल्म छोड़नी पड़ी थी जिसके बाद इसे अनुराग कश्यप ने पूरा किया। यह फिल्म देखकर लगता है कि फिल्म के साथ भी ज़बर्दस्त ‘मीटू’ हुआ है जो इसे वन टाइम वॉच का ही दर्जा दे पाता है।

*यह समीक्षा लेखक के लोकप्रिय ब्लॉग cineyatra.com के इस लिंक पर भी उपलब्ध है।

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