शहर के बाहरी पॉश इलाके की एक शानदार कोठी। उसमें अकेली रह रही एक जवान लड़की का आधी रात को मर्डर हो जाता है। हत्यारा सनकी है। वह वीडियो बनाते हुए लड़की की गर्दन को तलवार से अलग करता है और धड़ को जला देता है। हमें लगता है कि यह फिल्म सीरियल किलिंग दिखाने वाली एक मर्डर-मिस्ट्री होगी।

शहर के वैसे ही पॉश इलाके की एक बड़ी कोठी में एक गार्ड और अपनी केयरटेकर के साथ रह रही सपना (तापसी पन्नू) को अंधेरे से डर लगता है। अतीत का एक हादसा उसका पीछा कर रहा है। हमें लगता है कि यह एक साइकलॉजिकल थ्रिलर होगी।

सपना ने साल भर पहले अपनी कलाई पर एक टैटू बनवाया था। उसे अक्सर वहां भयानक दर्द होता है। इस टैटू से जुड़ा एक सच सामने आता है तो सपना के साथ हम भी चौंक उठते हैं और हमें लगता है कि यह एक हॉरर फिल्म होगी।

हम आपसे मजाक नहीं कर रहे।

दरअसल इस फिल्म की यही खासियत है कि यह देर तक हमें इसी में उलझाए रखती है कि आखिर इसका फ्लेवर क्या है? यह अलग बात है कि इसकी यही खासियत हिन्दी फिल्मों के उन दर्शकों को इसकी खामी लग सकती है जो घिसे-पिटे ढर्रे की फिल्में देखते आए हैं और जिन्हें पहले रामसे ब्रदर्स और बाद में विक्रम भट्ट हॉरर के नाम पर नींबू-मिर्ची चटाते रहे हैं।

इस किस्म की फिल्मों को लेकर दक्षिण भारत में हो रहे एक्सपेरिमैंट हमें चौंकाते रहे हैं। अरे हम आपको बताना ही भूल गए। यह फिल्म असल में तमिल-तेलुगू में बनी है और हिन्दी में इसे डब किया गया है। हिंदी में इसे एक्सपेरिमेंट के शौकीन अनुुराग कश्यप ने पेश किया है।

यह फिल्म एक साथ कई बातें करती दिखती है। लेकिन आखिरकार यह एक लड़की के अपनी निराशा, अपने डर को जीतने, उठने और भिड़ने का मैसेज देती है। हां, नायिका सपना के साथ हुए हादसे पर कुछ बातें और असरदार ढंग से कहनी चाहिए थीं। वे होतीं तो फिल्म की धार और बढ़ सकती थी।

फिल्म का अंत लीक से हट कर है। दर्शक ऐसा क्यों हुआ, किसने किया टाइप के सवाल पूछ सकते हैं। इसीलिए यह फिल्म देखना आसान भी नहीं है। दिमाग लगाने के शौकीन ही इसे गहराई से पकड़ सकेंगे। फिल्म एक वीडियो गेम की तरह चलते हुए कहानी कहती है, जहां प्लेयर को तीन लाइफ लाइन मिलती हैं, जहां उसे खुद ही अपनी चतुराई और हिम्मत से जीत हासिल करनी होती है। फंडा क्लियर है। भिड़ कर ही जीता जाता है, पीठ दिखा कर नहीं।

अश्विन सर्वनन के डायरेक्शन में बात है। कैमरा अपने मूवमेंट और एंगल से ज़रूरी तनाव बनाता है। कमरा, कमरे में रखे सामान अपनी जगह एकदम फिट लगते हैं। रोशनी का कम-ज्यादा होना दृश्यों के प्रभाव को कई गुना बढ़ाता है। बैकग्राउंड म्यूज़िक भी असरदार है। तापसी पन्नू सपना के किरदार के अंदर तक गई हैं। उनके चेहरे पर बदलते भाव उनके किरदार को विश्वसनीय बनाते हैं। उनकी केयरटेकर कलाम्मा बनीं विनोदिनी वैद्यनाथन अद्भुत अभिनय करती हैं। इन दोनों के बीच की कैमिस्ट्री भी जमती है।

लीक से हट कर कुछ अनोखा देखने की भूख हो, तो इस फिल्म को देख सकते हैं। भूख आपकी पूरी तरह मिट सकेगी या नहीं, इसकी गारंटी हमारी नहीं, क्योंकि जेब तो आपकी है।

*यह समीक्षा लेखक के लोकप्रिय ब्लॉग cineyatra.com के इस लिंक पर भी उपलब्ध है।

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