बॉलीवुड के फिल्मकारों को इतिहास की घटनाओं पर फिल्म नहीं बनानी चाहिए। इससे फिल्म महज फिल्म नहीं रह जाती, लोगों को इतिहास लगने लगती है। और इतिहास के साथ बलात्कार तो होता ही है।

‘मिशन मंगल’ के साथ अच्छी बात ये है कि इसमें इमोशनल ड्रामा इतना है कि ये पूरी तरह से एक बॉलीवुड की फिल्म दिखाई देती है। इतिहास इसमें नमक के बराबर है। लेकिन फिल्म के अंत में प्रधानमंत्री मोदी की आवाज़ और भारत के मंगल मिशन की चर्चा करते हुए जिस तरह उनका वीडियो दिखाया गया है, वो फिल्म की कहानी को ऑथेंटिकेट करने की कोशिश है। इसलिए हमारी मजबूरी है कि हम उस पर भी चर्चा करें।

फिल्म में बेसिक कहानी ये है कि इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) की वैज्ञानिक तारा (विद्या बालन) के पास आइडिया है भारत के पहले मंगल मिशन की कल्पना को सच्चाई में बदलने का।

इसरो में उससे सीनियर वैज्ञानिक राकेश (अक्षय कुमार) को उस पर भरोसा है। दरअसल ये उसका सपना है। लेकिन जब दोनों अपना प्रपोजल सबके सामने रखते हैं तो सबने इसे इंपॉसिबल कहा। क्योंकि अमेरिका 8 बार कोशिश कर चुका है। रशिया 4 बार कोशिश कर चुका है। चाइना एक बार कोशिश कर चुका है लेकिन अब तक किसी को कामयाबी नहीं मिली।

राकेश ये कहकर इसरो के डायरेक्टर ( विक्रम गोखले) को कन्विंस करने में कामयाब हो जाता है कि सोचिए अगर भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बन जाए जो इस मिशन में कामयाब हुआ हो!

लेकिन इस मंगल मिशन की राह इतनी आसान नहीं थी। सबसे बड़ी प्रॉब्लम है बजट की। सरकार इस मिशन के लिए पैसा देने को तैयार नहीं है। दूसरी प्रॉब्लम है सीनियर वैज्ञानिक और इसरो का सीनियर अधिकारी रूपर्ट (दिलीप ताहिल)। वो राकेश और तारा के इस मिशन की राह में हर मुमकिन रोड़े अटकाता है। वो उन्हें अनुभवी वैज्ञानिकों की जगह अनाड़ी वैज्ञानिकों की टीम देता है।

लेकिन वे सभी युवा वैज्ञानिक छुपे रुस्तम साबित होते हैं। और आखिरकार मिशन को कामयाबी मिलती है। भारत अंतरिक्ष विज्ञान में अपना परचम सबसे ऊपर फहराने में कामयाब रहता है। टीम लीडर राकेश एक्साइटमेंट में पूरी दुनिया को कहता है- कॉपी इट! यानी अब इसकी नकल करो!

सबसे पहले तो ये साफ कर लेना ज़रूरी है कि भारत मार्स मिशन में कामयाब होने वाला पहला देश नहीं था। अमेरिका, रशिया और यूरोपीय यूनियन के बाद भारत ये कामयाबी हासिल करने वाला चौथा देश है। और ये देश 1-2 बार नहीं 26 बार ये कामयाबी दुहरा चुके हैं। तो उनके इसरो की इस टीम की नकल करने का तो सवाल ही नहीं है। ये अतिउत्साह में राष्ट्रवाद का झंडा बुलंद करने के लिए दिया गया बयान है। दुख की बात ये है कि ये झूठ की बुनियाद पर टिका है।

हां ये सच है कि सितम्बर 2014 में मिली इस कामयाबी से भारत एशिया का ऐसा पहला देश बन गया था। चाइना से पहले उसे इसमें कामयाबी मिली। और उसे अपनी पहली कोशिश में ये कामयाबी मिली। जबकि अमेरिका, रशिया और यूरोप को कई बार नाकामयाबी का मुंह देखना पड़ा था। लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि उनके मंगल मिशन ​50 साल पहले शुरू हो चुके थे। दरअसल भारत की प्राथमिकताएं अलग थीं। और इसरो के अंतरिक्ष अभियान विकास की उन्हीं प्राथमिकताओं के अनुसार चल रहे थे।

‘मिशन मंगल’ फिल्म की कहानी जिस इमोशनल ट्रैक पर चलती है उसमें दरअसल ये मुद्दा है ही नहीं कि कौन पहले पहुंचा। मुद्दा ये है कि अनुभवहीन टीम, सरकार से मार्स मिशन के लिए पैसा ना मिलने और सीनियर अफसर की साज़िश के बावजूद कैसे मार्स मिशन को कामयाबी के अंजाम तक उन्होंने पहुंचाया। अमेरिका को इन सब चीजों में भारत से मुकाबला करने की तो वाक़ई कोई ज़रूरत नहीं है।

इसरो के जिस जलकुकड़े सीनियर अफसर और साइंटिस्ट रूपर्ट को इनकी टीम को फोड़ते दिखाया गया है और इसकी वजह ये भी है कि उसके चंद्रयान का प्रोजेक्ट रोककर ही इस मार्स मिशन के लिए पैसे का इंतजाम किया गया, इस कहानी की सच्चाई हम कभी नहीं जान पाएंगे। लेकिन ये फिल्म का ड्रामा एलीमेंट ज़्यादा लगता है।

राकेश और तारा के इस प्रोजेक्ट का कुल बजट 800 करोड़ का था। लेकिन उन्हें मजबूरन 400 करोड़ यानी आधे बजट में मिशन पूरा करना पड़ा।

फिल्म में नवंबर 2014 में मिशन पूरा होते दिखाया गया है जबकि हकीकत में सितंबर 2014 में मिशन कामयाब हुआ था। ये 2 महीने आगे क्यूं खिसकाए गए, समझ से परे है। क्यूंकि बारिश के मौसम से फाइनल स्टेज पर मिशन फेल होने का जो डर दिखाया गया है उस मौसम के चांस भी सितंबर में ही ज़्यादा हैं।

मई 2014 में नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बन गए थे। फिल्म में मंगल मिशन में कामयाबी पर उन्हें देश को बधाई देते दिखाया सुनाया गया है। क्या मोदी जी ने या उनकी सरकार ने इस मिशन के लिए पैसा बढ़ाया? फिल्म की कहानी में इस सवाल का जवाब नहीं मिलता।

मार्स मिशन की टीम में एक बुजुर्ग को छोड़कर सबको यंग दिखाया गया है। किसी की शादी नहीं हो रही है। किसी की सास बच्चा ना होने का ताना दे रही है। कोई लिव इन रिलेशनशिप में रह रही है। टीम लीडर्स कि बात करें तो तारा (विद्या बालन) को एक बेटा और एक बेटी दिखाए गए हैं। लेकिन राकेश की पर्सनल लाइफ के बारे में कुछ नहीं बताया गया है। किसी तरह का कोई परिवार नहीं दिखाया गया है। मां या बाप तक नहीं। यादों में भी नहीं। बल्कि राकेश का तो घर ही नहीं दिखाया गया कि वो रहता कहां है जबकि फिल्म का वो लीड किरदार है।

मुद्दा यहां सिर्फ ये है कि इतने बड़े मिशन को इतने यंग और नौसिखिया लोगों की टीम द्वारा ऑपरेट होते दिखाना क्या फिल्म के ड्रामा एलीमेंट की मजबूरी थी? फिल्म के अंत में असल किरदारों को तस्वीरों में दिखाया गया है। और लगभग सभी अधेड़ या बुजुर्ग दिख रहे हैं। भैया, इतनी बड़ी घटना में इतना घालमेल क्यों??

फिल्म में एक जगह दिखाया गया है कि इसरो के डायरेक्टर ने टीम लीडर राकेश को इस मिशन के लिए अनुभवी वैज्ञानिक देने का ऑफर किया। लेकिन राकेश मना कर देता है। और उन अनुभवहीन लगभग नौसिखिए वैज्ञानिकों के साथ काम करने का फैसला करता है जिनके काम को वो बिल्कुल नहीं जानता। क्यूं भला? ताकि हीरोगिरी कायम रहे?

अब इस फिल्म को विशुद्ध ड्रामा के नजरिए से देखें। फिल्म में इमोशन और कॉमेडी दोनों अच्छे से दिखाए गए हैं। टीम मेंबर्स की निजी जिंदगी की परेशानियां, तनाव और समर्पण को अच्छे से दिखाया गया है। सभी किरदार अच्छे से उभारे गए हैं। बल्कि इनकी निजी ज़िंदगी के ब्योरो में फिल्म ज़्यादा ही चली गई है इसलिए फिल्म का फर्स्ट हाफ अपने मार्स मिशन से बिल्कुल भटका दिखाई देता है। इमोशनल ड्रामा ज़्यादा चलता है और तकनीकी बातें ना के बराबर।

लेकिन दूसरे हाफ में फिल्म अपने ट्रैक पर सधी हुई चलती है और मंगल मिशन का माहौल पूरी तरह से जम जाता है। फिल्म में जब सैटेलाइट मार्स की ग्रैविटी के दायरे में प्रवेश करता है, और मंगल ग्रह की तस्वीरें भेजता है, तो ये सीन फुल इमोशनल बन गए हैं। ये मन को छूते हैं।

बल्कि स्लो मोशन में दिखने के कारण सैटेलाइट भी एक क्यूट और साहसी किरदार की तरह लगता है। ये इस पूरी फिल्म की एक खास कामयाबी है। क्यूंकि एक साहसिक मिशन में भेजे गए सैटेलाइट को इस तरह स्लो मिशन में देख पाना दुर्लभ है। फिल्म में ही सही लेकिन ये देखकर एक्साइटमेंट होता है। फिल्मकार को इसके लिए सौ में सौ नंबर देने पड़ेंगे।

एक्टिंग की बात करें तो जो किरदार गढ़े गए हैं, उसमें सभी एक्टर्स फिट दिखाई देते हैं। अक्षय और विद्या पर फोकस ज़्यादा है और दोनों ने अपनी अदाकारी का बेहतरीन रिकॉर्ड बनाए रखा है। तापसी, सोनाक्षी, कीर्ति कुल्हारी, नित्या मेनन, ज़ीशान अय्यूब, संजय कपूर सबने अपने रोल के साथ न्याय किया है।

साइंस पर बेस्ड फिल्म में आस्था, पूजा पाठ और मंगल मिशन के लिए पंडित जी को नारियल फोड़ते दिखाकर बहुत लोगों को खुश किया गया है।

कुल मिलाकर लगता है कि फिल्म चलेगी। फिल्ममेकिंग की दृष्टि से ये बहुत यादगार फिल्म नहीं है। लेकिन आम दर्शकों का मनोरंजन करने लायक ज़रूर बन गई है। इसमें अक्षय थोड़े बूढ़े लगे हैं। लेकिन ये तो काल की स्वाभाविक क्रूरता है। अक्षय लगभग तीस साल से दर्शकों का मनोरंजन करते आ रहे हैं। आगे भी करते रहेंगे। इसलिए उनके फैंस निराश ना हों। और फिल्म देखें।

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