गुरुदेव टैगोर की पुण्यतिथि 7 अगस्त पर विशेष

अपने रचे साहित्य और रवींद्र संगीत से पूरी दुनिया में पहचाने गए गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की रचनाओं पर बंगाल में तो ढेरों फिल्में बनीं ही, हिन्दी सिनेमा में भी उनके साहित्य की ख़ुशबू बिखरी पड़ी है। उनकी रचनाओं पर बनी प्रमुख हिन्दी फिल्मों पर आइए डालते हैं एक नजर।

टैगोर की रचनाओं पर बनी फिल्मों में सबसे पहला नाम ‘बलिदान’ का आता है। 1927 में बनी यह एक मूक फिल्म थी जिसे ‘सेक्रिफाइस’ नाम से भी जाना जाता है। 1887 में लिखे गए टैगोर के नाटक ‘विसर्जन’ पर आधारित इस फिल्म को नवल गांधी ने निर्देशित किया था। मास्टर विठ्ठल, सुलोचना, जुबैदा, सुल्ताना, जॉनी बाबू आदि की प्रमुख भूमिकाओं वाली यह फिल्म एक काल्पनिक राज्य में प्रगतिशील सोच वाले राजा और रूढ़िवादी पुजारी के वैचारिक टकराव पर आधारित थी।

टैगोर के इस नाटक को जब पहली बार मंचित किया गया था तो खुद गुरुदेव ने इसमें अभिनय किया था। ‘बलिदान’ फिल्म शुरू में तो नहीं चली लेकिन बाद में इसे खूब सफलता मिली और इसे उस दौर की दस बेहतरीन फिल्मों में गिना गया था। यहां तक कि इंडियन सिनेमॉटोग्राफ कमेटी ने इसे पश्चिमी देशों की फिल्मों को भारतीय सिनेमा का एक उत्कृष्ट जवाब बताया था।

‘काबुलीवाला’ 1961

टैगोर की रचनाओं पर बनी हिन्दी फिल्मों में से सबसे चर्चित नाम ‘काबुलीवाला’ है। 1961 में आई निर्माता बिमल रॉय की यह फिल्म टैगोर की इसी नाम की कहानी पर बनी एक बेहद मार्मिक फिल्म है जिसमें अभिनेता बलराज साहनी ने काबुलीवाले का किरदार निभाया था। उनके साथ इस फिल्म में उषा किरण, सज्जन, सोनू, पद्मा, लक्ष्मी, असित सेन आदि थे।

काबुल (अफगानिस्तान) का रहने वाला अब्दुर रहमत खान कोलकाता की गलियों में मेवे बेचता है और यहां की एक बच्ची में अपनी बेटी की छवि देखता है। इस फिल्म को निर्देशित किया था हेमेन गुप्ता ने जो नेता जी सुभाष चंद्र बोस के निजी सचिव रह चुके थे। दिलचस्प बात यह भी है कि टैगोर की इस बांग्ला कहानी का अंग्रेजी अनुवाद उन आइरिश महिला मार्ग्रेट एलिजाबेथ नोबल ने किया था जिन्हें सब सिस्टर निवेदिता के नाम से जानते हैं।

इस फिल्म में प्रेम धवन का लिखा और सलिल चौधरी के संगीत से सजा गीत ‘ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन…’ तो आज भी भरपूर सुना जाता है।

‘बायोस्कोपवाला’ 2017

करीब दो बरस पहले आई निर्देशक देव मेढेकर की डैनी अभिनीत फिल्म ‘बायोस्कोपवाला’ इसी ‘काबुलीवाला’ की कहानी का एक आधुनिक रूपांतरण थी। आदिल हुसैन, गीतांजली थापा, टिस्का चोपड़ा, ब्रजेंद्र काला ने भी फिल्म में प्रमुख भूमिकाएं निभाई थीं।

1946 में आई बांबे टॉकीज की नितिन बोस निर्देशित ‘मिलन’ टैगोर के 1906 में लिखे गए चर्चित उपन्यास ‘नौकाडूबी’ पर बनी थी। यह एक ऐसे युवक की कहानी है जिसका विवाह उसकी मर्जी के बिना एक लड़की से कर दिया जाता है। जब वह अपनी नववधू को लेकर चलता है तो रास्ते में नाव डूब जाने से उस पर सवार कई लोग मारे जाते हैं और किसी और की पत्नी को वह अपनी पत्नी समझ कर ले आता है।

‘मिलन’ 1946

दिलीप कुमार और मीरा मिश्रा की प्रमुख भूमिकाओं वाली इस फिल्म को उस समय काफी सराहा गया था। बाद में इसी कहानी पर दो फिल्में और बनीं। एक तो रामानंद सागर ने भारत भूषण, बीना राय, आशा पारेख, प्रदीप कुमार को लेकर 1960 में ‘घूंघट’ नाम से बनाई। इस फिल्म के गीत ‘मोरी छम छम बाजे पायलिया…’ और ‘मेरी पत राखो गिरधारी…’ काफी हिट हुए थे।

‘घूंघट’ 1960

इसी कहानी पर सुभाष घई के बैनर तले ऋतुपर्णो घोष ने बांग्ला में ‘नौकाडूबी’ नाम से ही एक फिल्म 2011 में बनाई थी जिसमें प्रसेनजित चटर्जी, जिशु सेनगुप्ता, रायमा सेन और रिया सेन केंद्रीय भूमिकाओं में थे।

‘नौकाडूबी’ 2011

ऋतुपर्णो घोष ने इस कहानी का सिर्फ ढांचा लेकर उसमें अपनी तरफ से काफी कुछ जोड़ा था। इसी फिल्म को हिन्दी में डब करके ‘कशमकश’ नाम से रिलीज किया गया था।

‘कशमकश’ का एक दृश्य

टैगोर की कहानी ‘समाप्ति’ पर बनी राजश्री प्रोडक्शंस की ‘उपहार’ (1971) भी एक उल्लेखनीय फिल्म थी। सुधेंदु रॉय के निर्देशन में बनी इस फिल्म में स्वरूप दत्ता, जया भादुड़ी, सुरेश चटवाल, नाना पल्सीकर, कामिनी कौशल, लीला मिश्रा आदि ने प्रमुख किरदार निभाए थे।

‘उपहार’ 1971

इस फिल्म की तारीफ इस बात से भी की जा सकती है कि इसे 45वें ऑस्कर पुरस्कारों में भारत की तरफ से विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए आधिकारिक तौर पर भेजा गया था। पति-पत्नी के आपसी संबंधों और उनके बीच की गलतफहमियों पर बनी इस फिल्म में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का मधुर संगीत था।

राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम और दूरदर्शन द्वारा निर्मित ‘चार अध्याय’ (1997) टैगोर के लिखे इसी नाम के आखिरी उपन्यास जो 1934 में आया था, पर आधारित थी। कुमार शाहनी निर्देशित इस फिल्म में रजत कपूर के अलावा सुमंतो चट्टोपाध्याय, नंदिनी घोषाल, कौशिक गोपाल जैसे कलाकार थे। यह कहानी 1930 के दशक के बंगाली पुनर्जागरण की पृष्ठभूमि पर लिखी गई थी।

‘लेकिन’ 1991

लता मंगेशकर निर्मित और गुलजार निर्देशित फिल्म ‘लेकिन’ गुरुदेव की लिखी कहानी ‘क्षुदित पाषाण’ से प्रेरित थी। 1991 में आई डिंपल कपाड़िया, विनोद खन्ना, अमजद खान, हेमा मालिनी अभिनीत इस फिल्म को पांच राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था।

टैगोर की रचनाओं की बात हो और ‘चोखेर बाली’ की बात न हो, यह संभव नहीं। गुरुदेव के इसी नाम के उपन्यास पर बनी और 2003 में रिलीज हुई ऋतुपर्णो घोष की इस बांग्ला फिल्म में ऐश्वर्या राय, प्रसेनजित चटर्जी, रायमा सेन आदि प्रमुख कलाकार हैं।

‘चोखेर बाली’ का एक दृश्य

मूलतः बांग्ला में बनी इस फिल्म ने देश-विदेश में ढेरों पुरस्कार, तारीफें और कामयाबियां बटोरीं और बाद में इसे हिन्दी में भी डब करके रिलीज किया गया।

टैगोर के उपन्यास ‘घरे बायरे’ पर इसी नाम से बनी सत्यजित रे की बांग्ला फिल्म काफी चर्चित रही थी। 2016 में रीमा मुखर्जी इसी पर आधारित एक हिन्दी फिल्म ‘अर्धांगिनी-एक अर्धसत्य’ लेकर आईं। लेकिन यह फिल्म कब, कहां रिलीज हुई और कहां गायब हो गई, इसका किसी को पता तक नहीं चला।

हिंदी सिनेमा के वर्तमान दौर में हो रहे साहसिक प्रयोगों को देखते हुए कहा जा सकता है कि टैगोर के साहित्य में अभी काफी संभावनाएं छुपी हुई हैं। महान साहित्य पर फिल्म बनाते समय डायरेक्टर के सामने बड़ी चुनौतियां तो होती हैं, लेकिन अगर कामयाबी से फिल्म बना ली जाए तो इन फिल्मों को जो स्थायी पहचान मिलती है उसका कोई जोड़ नहीं। फिर डायरेक्टर को जो मान-सम्मान से नवाजा जाता है, वो तो बोनस है ही।

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