जापान के मशहूर फिल्मकार अकीरा कुरोसावा ने कहीं कहा था ‘‘सत्यजित रे की फिल्मों को न देखने का मतलब इस दुनिया में सूर्य या चंद्रमा के अस्तित्व को जाने बिना रहने जैसा है।’’

एक महान फिल्मकार किसी दूसरे-खासतौर पर समकालीन-महान फिल्मकार के बारे में शायद इससे बड़ी टिप्पणी नहीं कर सकता। एशिया में कुरोसावा और रे दो ऐसी फिल्मी हस्तियाँ हैं जिन्हें विश्व सिनेमा के शलाका पुरूषों में बिना संकोच के गिना जा सकता है।

पश्चिम के लिए लंबे समय तक भारतीय सिनेमा ही नहीं बल्कि भारत का मतलब सत्यजित रे का बंगाल हो गया था। किसी भी दूसरे भारतीय फिल्मकार के लिए यह आसान नहीं है कि वह खुद को रे का उत्तराधिकारी समझ सके। लेखक, फिल्मकार, चित्रकार, संगीतकार, कला-साहित्य-संगीत मर्मज्ञ, डिजाइनर, फोटोकार-रे दरअसल ‘रेनेसां’ की कोई हस्ती लगते हैं। फिल्मकार श्याम बेनेगल ने कहीं कहा था कि रे बंगाल रेनेसां के आखिरी नाम और सच्चे अर्थों में आधुनिक एक साथ नजर आते हैं।

सत्यजीत रे सरीखी दृष्टि आसानी से नहीं मिलती। विश्व सिनेमा के महान और मार्मिक क्षणों की कोई सूची बनाई जाए, तो रे की कालजयी फिल्मों के प्रसंग इसमें बहुत ऊपर नजर आएँगे। ‘पथेर पाँचाली’ (1955) का वह दृश्य क्या कभी कोई भूल सकता है जब महीनों बाहर रहने के बाद हरिहर घर लौटता है और अपनी पत्नी सर्वजया को एक-एक करके बड़े उत्साह से उपहार दिखाना शुरू करता है। जब वह अपनी बेटी दुर्गा के लिए लाया उपहार निकालता है, तो उसे पता नहीं है कि दुर्गा मर चुकी है। सर्वजया फूट-फूट कर रोने लगती है।

पथेर पांचाली का ट्रैजिक दृश्य

दरअसल ‘पथेर पाँचाली’ में इस तरह के एक नहीं अनेक दृश्य हैं जो मनुष्य को अधिक मानवीय होने की प्रेरणा देते हैं। रे की अपू त्रयी (पथेर पाँचाली, अपराजित और अपूर संसार), चारूलता, जलसाघर और अरण्येर दिन रात्रि इन छह फिल्मों के बल पर ही फिल्मकार की महानता को स्वीकारा जा सकता है। इनमें से अंतिम फिल्म 1969 में बनी थी। इसका मतलब यह नहीं है कि रे बाद के 23 वर्षों में महत्त्वपूर्ण फिल्में नहीं बना पाए। बल्कि रे का तो विश्वास आखिरी समय तक काम करते रहने का था। ऐसा उन्होंने किया भी। अंतिम तीन सालों में उन्होंने लगातार तीन फिल्में बनाईं और ये फिल्में अपने समय की महत्त्वपूर्ण फिल्में हैं।

ऑस्कर पुरस्कार के बाद एक कवि मित्र की बधाई के जवाब में रे ने लिखा था कि बस मैं इतना स्वस्थ रहना चाहता हूँ कि हर साल एक फिल्म बना सकूँ। बीमारी ने रे की गतिविधियों को सीमित कर दिया था पर प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल बनाने की उनमें असाधारण क्षमता थी। आखिरी फिल्म ‘आगंतुक’ की पटकथा कमाल की है। लोकेशन पर जाकर वे सक्रिय नहीं रह सकते थे पर फिल्म को लिखने, उसकी विजुअल भाषा खोजने में वे सारी बारीकियों को ध्यान में रखते थे।

‘आगंतुक’ के एक दृश्य में उत्पल दत्त। 2010 में ठीक इसी कहानी पर फिल्म ‘अतिथि तुम कब जाओगे’ बनी थी।

एक गहरी नैतिक दृष्टि सत्यजित रे को दूसरों से अलग करती थी। उन्होंने आदर्श दर्शक वर्ग की हमेशा तलाश की। वे जानते थे कि सीमित दर्शक वर्ग का भी बड़ा और सफल सिनेमा हो सकता है पर एक आदर्श सफल फिल्म वे उसे मानते थे जो समझौता किए बिना आर्थिक दृष्टि से सफल हो सके।

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