सत्यजित रे का विश्वास कुछ बुनियादी मूल्यों में था। मिसाल के लिए ईमानदारी को वे बड़ा मूल्य मानते थे और मनुष्य में पाखंड को दुर्भाग्यपूर्ण मानते थे। दलितों के प्रति सहानुभूति को भी वे जरूरी मानते थे। जाहिर है कि ये सारी चीजें उनकी फिल्मों में भी आईं।

खासतौर पर उनके स्त्री पात्र मानवीय गरिमा का अद्भुत प्रमाण हैं। माधवी मुखर्जी (चारूलता और महानगर), शर्मिला ठाकुर (अपूर संसार और नायक), अपर्णा दासगुप्त (तीन कन्या), वहीदा रहमान (अभिजन), सिमी ग्रेवाल (अरण्येर दिन रात्रि), शबाना आजमी (शतरंज के खिलाड़ी), स्मिता पाटील (सद्गति), स्वातिलेख चटर्जी (घरे बाइरे)- रे की फिल्मों में स्त्री पात्रों का संसार अद्वितीय है। अपू त्रयी के तो सभी पात्र जीवन के सुखों-दुखों, राग-विराग की अद्भुत अभिव्यक्ति हैं।

सत्यजित रे की फिल्मों के कुछ प्रसिद्ध स्त्री पात्र

रे के पुरूष पात्र (खासतौर पर सौमित्र चटर्जी द्वारा पर्दे पर लाए गए पात्र) भी उनके ईमानदारी के सीधे-सादे दर्शन की जटिल बारीकियों में जाने का दुस्साहस करते नजर आते हैं। अपू (पथेर पाँचाली), पिकू (पिकू) और मुकुल (सोनार केल्ला) सरीखे बच्चे सिनेमा में क्या आसानी से आते हैं? ‘पथेर पाँचाली’ की अविस्मरणीय वृद्धा और ‘शाखा प्रशाखा’ के नब्बे की उम्र पार कर चुके वृद्ध को हम क्या कभी भूल सकते हैं? इसी तरह की सभी चीजों में रे की महानता छिपी हुई है।

‘पथेर पांचाली’ के एक दृश्य में वयोवृद्ध चुन्नीबाला देवी

रे का सिनेमा सजग रूप से चुने गए मूड और माहौल का सिनेमा है। हॉलीवुड की ‘स्पेक्टेकल’ शैली ने उन्हें कभी आकर्षित नहीं किया। दुनिया भर के सभी बड़े पुरस्कार पाने के बाद रे को आखिर में ऑस्कर पुरस्कार भी मिला। कारण जो भी हों, हॉलीवुड ने भी इस ‘दूसरी दुनिया’ के फिल्मकार की प्रतिभा को स्वीकार किया।

एक ब्रिटिश फिल्म समीक्षक ने रे के परिवार की तुलना ब्रिटेन के हक्सले परिवार से की है। रे के दादा उपेंद्र किशोर ब्रह्मसमाज के बड़े प्रवक्ता थे। छपाई के क्षेत्र में उन्होंने क्रान्तिकारी काम किया और बंगला में बाल साहित्य को उन्होंने प्रतिष्ठा दिलाई। सत्यजित रे के पिता सुकुमार रे चित्रकार और कवि दोनों थे। 1923 में उनकी 34 साल की अल्पायु में मृत्यु हो गई। तब सत्यजित सिर्फ ढाई साल के थे। रे को अपना बचपन मामा के यहां बिताना पड़ा।

सत्यजित रे की पत्नी विजया उम्र में उनसे दो साल बड़ी थीं।। उनके सुपुत्र संदीप रे एक सुपरिचित फिल्म निर्देशक हैं।
सत्यजित रे ने शांति निकेतन में भी अधूरी पढ़ाई की थी। बाद में वे एक ब्रिटिश विज्ञापन एजेंसी में चले गए। फिल्मों में सक्रिय होने से पहले पुस्तक डिजाइनिंग में भी उन्होंने महत्त्वपूर्ण काम किया। लेकिन अपनी पहली फिल्म ‘पथेर पाँचाली’ बनाने के लिए रे को पत्नी के गहने गिरवी रखने पड़े। बंगला बाल और किशोर साहित्य में रे बहुत सम्मानित नाम हैं। प्रोफेसर शंखू और जासूस फेलू दा उनके रचे लोकप्रिय चरित्र हैं।

इमर्जेंसी के दौर में रे ने श्रीमती गाँधी के लिए फिल्म बनाने से इनकार कर दिया था। उनकी बाल फिल्म ‘हीरक राजार देशे’ में इमर्जेंसी की आलोचना भी है।

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