मीना कुमारी की शख़्सियत, ज़िदगी, अभिनय के जादू, ट्रेजडी, पीड़ा आदि को ‘साहब, बीवी और गुलाम’ (1962) में छोटी बहू के किरदार में अच्छी तरह से देखा जा सकता है। गुरूदत्त की इस फिल्म में भले ही डायरेक्टर के रूप में डायलॉग राइटर अबरार अलवी का नाम गया हो लेकिन फिल्म के इतिहास से परिचित सभी यह जानते हैं कि इस फिल्म के एक-एक फ्रेम में गुरूदत्त का डायरेक्शन-स्टाइल हावी था।

‘साहब, बीवी और गुलाम’ में अनेक यादगार पात्र हैं। छोटे-छोटे पात्र भी याद रह जाते हैं। घड़ी बाबू सरीखे सनकी पात्र हैं जो सूनी हवेलियों में एक भयावह हँसी के साथ बदलते समय को दर्ज करना चाहते हैं। हवेली का एक साधारण नौकर भी अपनी छाप छोड़ता है। पर इन सबके केंद्र में मीना कुमारी यानी छोटी बहू है।

‘साहब, बीवी और गुलाम’ में के एक दृश्य में मीना कुमारी

यह गौर करने की बात है कि ‘साहब, बीवी और गुलाम’ में जबा यानी वहीदा रहमान के पात्र को भी पर्याप्त महत्त्व दिया गया है। वहीदा दरअसल गुरूदत्त की दो चर्चित फिल्मों-‘प्यासा’ और ‘कागज के फूल’ में अपनी एक अलग छवि स्थापित कर चुकी थीं। ‘साहब, बीवी और गुलाम’ में भी जबा की एक महत्त्वपूर्ण उपस्थिति है।

‘साहब, बीवी और गुलाम’ में गुरूदत्त  के साथ वहीदा रहमान


लेकिन पूरी फिल्म में जैसे छोटी बहू की दर्द भरी आवाज को दर्शक बराबर सुनता रहता है-तब भी जब पर्दे पर वह नहीं होती है।

बल्कि छोटी बहूू को हम पर्दे पर बहुत बाद में देखते हैं। निर्देशक ने हवेली में उसकी जादुई और रहस्यमय उपस्थिति को स्थापित तो पहले ही कर दिया है। पर पर्दे पर मीना कुमारी का क्लोजअप बहुत बाद में आता है। आने से पहले भी निर्देशक मीना की अद्वितीय आवाज का पूरा फायदा उठाकर रहस्य के अँधेरे और आलोक दोनों का भरपूर सिनेमाई इस्तेमाल करता है।

भूतनाथ यानी गुरूदत्त को रात के अँधेरे में छोटी बहू बुलाती है। उसे पता है कि भूतनाथ मोहिनी सिंदूर बनाने वाली कंपनी में कर्मचारी है। कंपनी का दावा है कि यह सिंदूर वशीकरण में मदद करता है। आपका प्रेमी आपसे दूर है, तो वह नजदीक आ जाएगा।

छोटी बहू का पति अपनी रातें कोठों पर बिताता है। उसके लिए यही मर्दानगी है। रात भर पीता है, नाच गाने देखता है। दिन भर सोता है। विवाह उसने किया है। पर पत्नी से उसका किसी भी तरह का रिश्ता नहीं है। उसकी पत्नी ऊँचे घर की नहीं है। मध्यवर्गीय पूजा पाठ करने वाली सुंदर स्त्री है। पर वह हवेली की बंद दुनिया में घुट-घुटकर मरना नहीं चाहती। उसकी छोटी-सी इच्छा है पति को अपने वश में करने की। इसीलिए उसने भूतनाथ को रात के अँधेरे में अपने कमरे में बुलाया है।

भूतनाथ और छोटी बहू

दर्शक पहले मीना कुमारी की आवाज को सुनता है। उसके मेहँदी रचे पैर दर्शक को दिखाई पड़ते हैं। भूतनाथ उसे अपना नाम बताता है। दर्शक को मीना कुमारी की आवाज सुनाई पड़ती है-एक ऐसी आवाज जिसमें मादकता भी है, पीड़ा भी। छोटी बहू कहती है, ‘बड़ा सुंदर नाम है।’

भूतनाथ को आश्चर्य होता है। इस बात पर भी कि उसके अजीबोगरीब और हँसी पैदा करने वाले नाम को छोटी बहू ने सुंदर कहा। जबा ने जब उसका पहली बार नाम सुना था, तो वह खिलखिला कर हँस पड़ी थी।

लेकिन निर्देशक ने कल्पना शक्ति का बड़ा सुंदर इस्तेमाल इस प्रसंग में किया है। छोटी बहू जब नाम को सुंदर बताती है, तो कैमरा मीना कुमारी के सुंदर चेहरे को दिखाता है। दरअसल निर्देशक भूतनाथ नाम की संुदरता पहचानने वाली स्त्री के सौंदर्य को एक झटके में दिखा देता है।

भूतनाथ के चेहरे पर दो तरह के आश्चर्य हैं। एक अपने नाम को सुंदर सुनकर। दूसरा, छोटी बहू की जादुई सुंदरता को सामने देखकर।

फिल्मफेयर के सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार के लिए मीना कुमारी की तीन फिल्में एक साथ चुनी गई थीं। ‘साहब, बीवी और गुलाम’, ‘मैं चुप रहूँगी’ और ‘आरती’। अंत में पुरस्कार छोटी बहू को मिला था।

मीना कुमारी के व्यक्तित्व में आँखों, ओठों और आवाज का केद्रीय स्थान था। इन तीनों ने मिलकर मीना कुमारी का एक अद्भुत सिनेमाई व्यक्तित्व बनाया। आँखों में सिर्फ सुंदरता नहीं थी-देखने से अभिनय की बारीकियों तक जाने की अद्वितीय क्षमता थी। ओठों ने चेहरे को ऐंद्रियता प्रदान की। आवाज और लहजे ने मीना कुमारी को मीना कुमारी बनाया।

पाकीज़ा में मीना कुमारी

मीना कुमारी ने वैसे तो बाद में रंगीन फिल्मों में भी काम किया। ‘पाकीजा’, ‘चित्रलेखा’, ‘फूल और पत्थर’ आदि मीना की रंगीन दौर की फिल्में हैं। लेकिन मीना कुमारी की उपस्थिति श्वेत-श्याम फिल्मों में ही सर्वश्रेष्ठ थी। मीना ही क्यों-मधुबाला, नर्गिस, गीता बाली, नूतन, वहीदा रहमान आदि सभी उस दौर की चर्चित अभिनेत्रियों की सिनेमाई छवि श्वेत-श्याम फिल्मों से अलग नहीं की जा सकती है।

हिंदी सिनेमा के इतिहास का यह सर्वश्रेष्ठ दौर था। निर्देशक, संगीतकार, गीतकार, अभिनेता, लेखक सभी श्रेष्ठ थे। पचास का दशक हिंदी फिल्मों का ‘स्वर्ण काल’ है। अभिनय, निर्देशन, संगीत सभी दृष्टियों से।

इतिहास की यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि इस दौर के अनेक प्रतिभाशाली नामों का अंत बहुत दुखद और त्रासद रहा। खासतौर पर अभिनेत्रियों के जीवन के साथ बीमारी, अकेलापन, मृत्यु आदि चीजें कुछ अजीब ढंग से जुड़ी हैं। जो नाम इस दौर के ‘सरवाइवर’ भी समझे गए उन्हें भी अंत में कैंसर सरीखी भयावह बीमारियों का सामना करना पड़ा।

छोटी बहू के कई अर्थ थे। एक अर्थ था मीना कुमारी। दूसरा था-गुरूदत्त। तीसरा था- गीता दत्त। इन सभी का अंत दर्द भरा था।

दिलीप कुमार को सिने इतिहासकारों ने ‘ट्रैजडी किंग’ कहा है। हालाँकि दिलीप कुमार कॉमेडी में भी बड़े आश्वस्त नजर आते थे। उनके अभिनय में विस्तार खूब रहा है। मीना कुमारी को भी ‘ट्रैजडी क्वीन’ यानी दर्द की देवी जैसे नाम दिए गए हैं। दुख जैसे मीना कुमारी की एक केंद्रीय पहचान है। मीना कुमारी का व्यक्तित्व देवी का बनाया जरूर गया लेकिन यह देवी दूसरी तरह की थी। मिसाल के लिए नूतन जैसी नहीं।

मीना कुमारी के व्यक्तित्व, आवाज और सुंदरता में ऐंद्रियता और मादकता का विशेष स्थान है। शायद उन्हें दर्द की देवी कहकर ‘पैडेस्टल’ पर बैठाना और उस रूप की पूजा करना भी उनके सिनेमाई व्यक्तित्व के साथ नाइंसाफी है। एक मीठा किस्म का दर्द मीना कुमारी की पहचान है। उन्हें अधिक चुनौतीपूर्ण भूमिकाएँ मिलनी चाहिए थीं। उस दौर के निर्देशकों ने मीना कुमारी की प्रतिभा का संपूर्ण इस्तेमाल नहीं किया।

….आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here