क्या कभी ऐसा हुआ है कि लता दी के गाए ‘ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी…’ सुनते हुए आपकी आंखें भीग गई हों? या ‘मेरा रंग दे बसंती चोला माए रंग दे…’ सुनकर आपकी मुठ्ठी बंध गई हो? या ‘चक दे.. चक दे इंडिया…’ की तान सुनकर आपको जोश आ गया हो? जब आपके अंदर देशप्रेम की हिलोरें उठती हैं तो यकीनन ऐसा होता है। देशप्रेम की इसी भावना को शब्दों में ढालकर रुपहले पर्दे पर उकेरने का काम करते आए हैं कुछ ऐसे गीत जो वक्त के साथ-साथ अमर हो गए।

बनते आए हैं देशभक्ति गीत

फिल्मी-गीतों में देश की बात शुरू से ही होती रही है। बांबे टाॅकीज की ‘किस्मत’ (1943) के ‘दूर हटो ऐ दुनिया वालो हिन्दुस्तान हमारा है…’ में कवि प्रदीप ने बेहद चालाकी से अंग्रेजी सेंसर बोर्ड को चकमा देते हुए उन दिनों चल रहे महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन को स्वर दिया था। यह गाना उन दिनों राष्ट्रगीत की तरह जगह-जगह गूंजता था।

देशभक्ति गीतों के अमर रचयिता कवि प्रदीप

1941 में आई ‘नया संसार’ में कविवर प्रदीप ने लिखा-‘एक नया संसार बसा ले एक नया संसार, कि जिसमें धरती हो आजाद कि जिसमें भारत हो आजाद…’। फिर ‘बंधन’ (1940) में आए ‘चल चल रे नौजवान…’ को तो उस समय की कई राज्य सरकारों तक ने मान्यता दे दी थी।

क्रांतिकारियों के लिखे गीत

बिस्मिल अजीमाबादी के लिखे ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है…’ को क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल ने गाकर अमर कर दिया। यह गीत मनोज कुमार वाली ‘शहीद’ के अलावा भी कई फिल्मों में आया। इसी फिल्म का ‘मेरा रंग दे बसंती चोला…’ बिस्मिल ने ही अपने साथियों के साथ लिखा था।

बंकिमचंद्र चटर्जी ने ‘वंदे मातरम्…’ अपने उपन्यास ‘आनंदमठ’ में लिखा था जो बाद में हमारा राष्ट्रीय गीत बना। इसी नाम की फिल्म में भी यह गीत है और इसके कई सारे वर्जन भी आए। ए.आर. रहमान वाला ‘वंदे मातरम्… मां तुझे सलाम…’ खासा लोकप्रिय हुआ।

छाते रहे देशभक्ति गीत

‘सन आॅफ इंडिया’ (1962) में शांति माथुर के गाए ‘नन्हा मुन्ना राही हूं, देश का सिपाही हूं…’ को आज भी सुना जाता है। ‘सिकंदर-ए-आजम’ (1965) के ‘जहां डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा…’ में भारत की खूबियों को खूबसूरती से बयां किया गया।

‘कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों’

चेतन आनंद की ‘हकीकत’ के ‘कर चले हम फिदा जान-ओ-तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों…’ में वतन पर मर-मिटने की भावना को बेहद खूबसूरती से पिरोया गया।

1965 में आई ‘शहीद’ में क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दिए जाने वाले सीन में ‘ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम…’ जैसे मर्मस्पर्शी गीत को देख—सुनकर इस देश के करोड़ों लोगों ने अपनी आंखें नम की हैं। इससे पुरानी वाली ‘शहीद’ का ‘वतन की राह में वतन के नौजवां शहीद हो…’ भी आज तक सुना जाता है।

और फिल्म ‘काबुलीवाला’ में मन्ना डे के गाए ‘ऐ मेरे प्यारे वतन…’ गीत को भला कौन भूल सकता है! हालांकि फिल्म के भीतर काबुल से मेवे बेचने आया एक पठान अपने देश को याद कर रहा है लेकिन इस गीत के बोल देशप्रेम की भावना से इस कदर लबरेज हैं कि कोई भी इसे सुन कर भावुक हो उठता है।

दिलीप कुमार की फिल्म ‘लीडर’ में ‘अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं…’ में भी खासा जोश दिखाई देता है। ‘नया दौर’ का ‘यह देश है वीर जवानों का…’ भले ही देशभक्ति के संदर्भ में इस्तेमाल नहीं हुआ था और हिन्दीभाषी राज्यों की हर शादी में बैंड वाले भी इसे जरूर बजाते हैं लेकिन इसके बोल रगों में लहू की रफ्तार तेज करने के लिए काफी हैं।

वक्त बदला बदले गीत

वक्त के साथ-साथ देशभक्ति-गीतों के रंग भी बदलते गए। मनोज कुमार की ‘क्रांति’ में ‘अबके बरस तुझे धरती की रानी कर देंगे..’, ‘चना जोर गरम…’ ‘क्रांति क्रांति…’ जैसे मसालेदार गानों में देश, क्रांति और बलिदान की बात की गई।

सुभाष घई की ‘कर्मा’ का ‘हर करम अपना करेंगे ऐ वतन तेरे लिए…’ देश की बात करता है। घई की ही ‘परदेस’ में ‘आई लव माई इंडिया…’ को भी युवा पीढ़ी ने काफी पसंद किया। मणिरत्नम की ‘रोजा’ का ‘भारत हमको जान से प्यारा है…’ भी खासा पसंद किया गया।

‘तिरंगा’

मेहुल कुमार की ‘तिरंगा’ में ‘यह आन तिरंगा है, यह शान तिरंगा है…’ को काफी पसंद किया गया था।

‘बॉर्डर’

जे.पी. दत्ता की ‘बॉर्डर’ में हालांकि ऐसा कोई गाना नहीं था जिसमें देशप्रेम का उफान हो लेकिन ‘संदेसे आते हैं…’ सैनिकों के मन की दशा को मार्मिक अंदाज में दर्शाता है तो वहीं ‘मेरे दुश्मन मेरे भाई मेरे हमसाये…’ में युद्ध की निरर्थकता की बात एक फौजी अफसर की जुबां से बहुत मार्मिक ढंग से की गई है।

आमिर खान की ‘सरफरोश’ देश में फैले पाकिस्तान स्पॉन्सर्ड आतंकवाद पर थी और इसके गीत ‘जिंदगी मौत न बन जाए संभालो यारो…’ में देशवासियों को बड़ी ही खूबी से सतर्क रहने की बात की गई।

सोनू निगम ने अपनी भावपूर्ण आवाज से इसे एक यादगार गीत बना दिया।

इक्कीसवीं सदी की देशभक्ति

‘लगान’ में क्रिकेट की तैयारी के लिए गाए गए इसके गीत ‘बार-बार हां बोलो यार हां…’ में ‘वही जो तेरा हाकिम है, जालिम है, घर जिसका पछिम है, यहां न बसने पाए…’ ही इसका असली अर्थ बयां कर देता है।

शाहरुख खान की बहुत महत्वपूर्ण फिल्म ‘स्वदेस’ में ‘ये जो देस है तेरा…’ एक अलग किस्म की देशभक्ति की बात करता नजर आया।

फरहान अख्तर की ‘लक्ष्य’ में ‘कंधों से मिलते हैं कंधे कदमों से कदम मिलते हैं…’ की गूंज सुनाई दी।

जे.पी. दत्ता की ‘एल.ओ.सी. कारगिल’ में ‘सीमाएं बुलाएं तुझे…’ ने जोश जगाया। राजकुमार हिरानी ने ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ में गांधी की महिमा पर ‘बंदे में था दम वंदे मातरम्…’ सुनवाया।

हाल के बरसों में देश की बात को सबसे ज्यादा अनोखेपन और संजीदगी से अगर किसी फिल्म ने कहा तो वह थी राकेश ओमप्रकाश मेहरा की ‘रंग दे बसंती’। इस फिल्म में ‘मोहे रंग दे बसंती…’, ‘रूबरू रोशनी…’ और ‘खून चला…’ जैसे गानों ने मौजूदा युवा पीढ़ी के जज्बात को शब्दों की शक्ल देकर यूं परोसा कि ये गाने सुन कर दिल जोश से भर जाता है।

शिमित अमीन ने ‘चक दे इंडिया’ हालांकि हॉकी के खेल पर बनाई लेकिन इसका टाइटल गीत ‘चक दे..चक दे इंडिया…’ आज स्कूल-कॉलेजों में 26 जनवरी, 15 अगस्त के मौकों पर खूब बजता है और देश को बुलंदी पर पहुंचाने की प्रेरणा देता है।

‘रॉकस्टार’ का भी जिक्र हो ही जाए। इस फिल्म का देशप्रेम से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रहा लेकिन इसके गाने ‘साड्डा हक एैथ्थे रख…’ को अगर युवा मन मुठ्ठियां लहराते हुए गाता है तो यकीन मानिए, कुछ तो है इसमें जो उन्हें जोश दिला रहा है। दुश्मन देश से मुकाबले के वक्त यही गीत देश के हौसले को बढ़ाने वाला गीत बन जाता है।

नव-राष्ट्रवाद की बयार

इधर कुछ बरसों से अपनी फिल्मों में नवराष्ट्रवाद की ऐसी लहर चल रही है जिसमें फिल्मकार और दर्शक दोनों पूरे मन से गोते लगा रहे हैं। फिल्मों में ऐसे विषयों और नायकों की बातें लगातार होने लगी हैं जो अपने-अपने मोर्चे पर देश के लिए लड़ रहे हैं, जूझ रहे हैं और ज्यादातर जीत हासिल कर रहे हैं। लेकिन जिस तरह एक दूसरे की देखादेखी होड़ में और हड़बड़ी के साथ हालिया फिल्मों में राष्ट्रवाद उभरा है वह फिल्मकारों को यह फुर्सत ही नहीं दे रहा है कि ठहरकर कुछ गहरा, कुछ गाढ़ा रचें जो कालजयी बन जाए, जैसा अधिकतर पुराने गीतों के साथ हुआ है। फिर भी 2018 में आई फिल्म ‘राजी’ का ‘ऐ वतन वतन मेरे आबाद रहे तू…’ को एक यादगार गीत कहा जा सकता है। यह गीत हमें बेहद भावुक करता है।

यह अलग बात है कि फिल्म में एक हिन्दुस्तानी जासूस पाकिस्तानी बच्चों को यह गीत सिखा रही होती है। लेकिन गीत गाते वक्त उसकी अपने देश भारत के प्रति मोहब्बत की भावना उमड़ रही होती है। इसी फिल्म का ‘लगा दे दांव पर दिल, अगर दिल राजी है…’। भी बेहद जोशीला था।

इसके अलावा ‘उरी-द सर्जिकल स्ट्राइक’ के छल्ला-गीत ‘मैं लड़ जाणा…’, ‘जग्गा जितेया ते मिलण वधाइयां…’, ‘जिगरा है जिगरा है…’, भी परदे पर अच्छे लगे।

‘केसरी’ के ‘तेरी मिट्टी में मिल जावां, गुल बण के मैं खिल जावां…’, ‘चक ले हुण हथियार, के अज्ज सिंह गरजेगा…’, ‘भारत’ के ‘जिंदा हूं मैं तुझ में…’, ‘मैं तुर पैया…’ में देशभक्ति की भावना अपने ढंग से जगाने की कोशिश की गई है।

‘केसरी’

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की बायोपिक ‘मणिकर्णिका’ के ‘मैं रहूं या न रहूं भारत यह रहना चाहिए…’, ‘विजयी भव…’ और ‘बोलो कब प्रतिकार करोगे…’ जैसे गीतों में देश के लिए बलिदान देने और देश के ​दुश्मनों से लोहा लेने का जोश छलका दिखाई देता है।

‘पी एम नरेंद्र मोदी’ का ‘सौगंध मुझे इस मिट्टी की…’ जैसे गीत भी आए हैं। ‘राग देश’, ‘परमाणु-द स्टोरी आॅफ पोखरण’, ‘गोल्ड’, ‘रोमियो अकबर वाॅल्टर’, ‘द ताशकंद फाइल्स’, ‘इंडियाज मोस्ट वांटेड’ जैसी फिल्मों में भी इस तरह के गीत थे हालांकि वे असरदार नहीं बन पाए। देशभक्ति का जज्बा जगाने के लिए गीत और संगीत की जो बुलंदी चाहिए उसकी इन गीतों में गहरी कमी दिखाई दी।

इस हफ्ते रिलीज हो रही मिशन मंगल, बाटला हाउस से लेकर साल के अंत तक कई ऐसी फिल्में आने वाली हैं जो दर्शकों के दिलों में देशभक्ति की उफनती लहर को बरकरार रखने की कोशिश करने वाली हैं। अब ये देखना बाकी है कि ये फिल्में क्या हमें देशभक्ति और देशप्रेम के ऐसे गीत दे पाती हैं जिन्हें लंबे समय तक याद रखा जा सके।

सच तो यह है कि फिल्मों और उसके गीत-संगीत की हमारी जिंदगी में खास जगह रही है। देशभक्ति या देशप्रेम में रचे-पगे गीत चाहे अतीत में आए हों या भविष्य में आएं, हम इन्हें सुन, देख, गाकर खुद को देश और देशवासियों के साथ गहराई से जुड़ा महसूस करते आए हैं और करते रहेंगे, यह तय है।

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