श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर हिन्दी फिल्मों में कृष्ण-कन्हैया से जुड़े गीतों पर एक नजर।

जन्माष्टमी का त्योहार चूंकि हमारे समाज में काफी लोकप्रिय है और श्रीकृष्ण को लोकनायक की-सी इमेज हासिल है सो हमारी फिल्मों में भी उनसे जुड़े प्रसंग और गीत काफी दिखाए गए। यह अलग बात है कि हिन्दी फिल्मों के निर्माण का गढ़ मुंबई में होने के कारण फिल्मों में भी जन्माष्टमी का वही रूप ज्यादा दिखाया गया जो मुंबई में प्रचलित है।

मुंबई में इसे गोकुल अष्टमी कहते हैं और शहर भर में जगह-जगह काफी ऊंचाई पर दही से भरी मटकियां टांगी जाती हैं जिन्हें युवक-युवतियों के दल मानव-पिरामिड बना कर फोड़ते और ईनाम पाते हैं। इस तरह के दृश्यों से जुड़े ‘गोविंदा आला रे आला जरा मटकी संभाल ब्रजबाला…’ जैसे गाने भी हमारी फिल्मों का हिस्सा बनते रहे हैं।

गीतों में छलकता कृष्ण-रस

फिल्मों में जन्माष्टमी का चित्रण अब भले ही कम हो गया हो लेकिन कोई वक्त था जब कृष्ण-भक्ति के रस में डूबे गीत फिल्मों में बड़ी तादाद में पाए जा सकते थे। इनमें से कुछ गीत तो ऐसे हैं जो हमारे समाज में कृष्ण-भक्ति का पर्याय ही समझे जाते हैं। राज कपूर द्वारा निर्देशित ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ का ‘यशोमती मैया से बोले नंद लाला, राधा क्यों गोरी मैं क्यों काला…’ को इनमें सबसे ऊपर गिना जा सकता है।

          ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ (1978)

फिल्म ‘खानदान’ के ‘बड़ी देर भई नंद लाला तेरी राह तके ब्रज बाला…’ और फिल्म ‘मालिक’ के ‘कन्हैया कन्हैया तुझको आना पड़ेगा…’ को तो इस कदर पसंद किया जाता है कि भारत के समूचे हिन्दी भाषी क्षेत्र के मंदिरों में जन्माष्टमी की आधी रात को श्रीकृष्ण के जन्म के समय होने वाले भजन-कीर्तनों में इन दो गीतों को गाकर ही बाल गोपाल के जन्म का स्वागत किया जाता है।

                   गुलजार निर्देशित ‘मीरा’ (1979)

फिल्म ‘आंखें’ के ‘मेरी सुन ले अरज बनवारी…’, ‘मिस मैरी’ के ‘वृंदावन का कृष्ण कन्हैया सबकी आंखों का तारा…’,  गुलजार निर्देशित ‘मीरा’ के ‘ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी…’, ‘कोहिनूर’ के ‘मधुबन में राधिका नाचे रे…’ आदि को भी लोकप्रिय कृष्ण भक्ति-गीतों में गिना जाता है।

संदर्भ से हट कर बने भजन

कुछ ऐसे गीत भी आए जिनका इस्तेमाल फिल्मों में तो किसी और संदर्भ में हुआ लेकिन इन्हें कृष्ण की आराधना के लिए गाया जाता है। इनमें ‘मुगल-ए-आजम’ के ‘मोहे पनघट पे नंद लाल छेड़ गयो रे…’ का स्थान सर्वोपरि है।

                     ‘मुगल-ए-आजम’ (1960)

ऐसे ही अन्य गीतों में ‘अमर प्रेम’ के ‘बड़ा नटखट है ये कृष्ण कन्हैया, का करे यशोदा मैया…’ भी है जो एक पराई स्त्री द्वारा पड़ोसी के बालक को अपने बेटे की तरह चाहने की कृष्ण-यशोदा की छवि से प्रेरित फिल्म थी।

                    ‘अमर प्रेम’ (1972)

ऐसा ही था फिल्म ‘छोटी बहू’ का ‘हे रे कन्हैया किस को कहेगा तू मैया…’। राज कपूर की ‘जागते रहो’ के अंत में आने वाले ‘जागो मोहन प्यारे…’, देव आनंद की ‘जॉनी मेरा नाम’ का ‘छुप छुप मीरा रोए…’, ‘बेटी बेटे’ का ‘राधिके तूने बंसुरी चुराई…’, ‘गीत गाता चल’ का ‘श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम…’, ‘हमसाया’ का ‘ओ कन्हैया आज पनघट पे…’, ‘शागिर्द’ का ‘कान्हा आन पड़ी मैं तेरे द्वार…’ आदि भी हमारी फिल्मों में आए कृष्ण-भक्ति के यादगार और लोकप्रिय गीतों के तौर पर दर्ज हैं।

                    ‘शागिर्द’ (1967)

‘हम दोनों’ का ‘प्रभु तेरो नाम…’, ‘चंबल की कसम’ का ‘परमेश्वर रखवाला…’, ‘हरि दर्शन’ का ‘प्रभु के भरोसे हांको गाड़ी…’, ‘भाभी की चूड़ियां’ का ‘ज्योति कलश छलके…’ जैसे गीतों से भी भक्ति-रस छलकता है।

फिल्में बदलीं, बदले गीत

जैसे-जैसे हमने और हमारी फिल्मों ने आधुनिकता की ओर कदम बढ़ाए इनमें भक्ति का रस कम ही हुआ। ‘मीरा का मोहन’ में ‘ओ कृष्णा यू आर द ग्रेटेस्ट म्यूजिशियन ऑफ दिस वर्ल्ड…’ काफी पहले आया था। सुभाष घई की ‘सौदागर’ में आया ‘नटखट बंसी वाले गोकुल के राजा मेरी अखियां तरस गईं अब तो आजा…’ काफी प्रासंगिक था जिसमें जन्माष्टमी के दिन पूरा परिवार श्रीकृष्ण की मूर्ति के सामने खड़ा होकर यह भजन गा रहा है और उधर इसी परिवार का बेटा बरसों के बाद घर लौट रहा है।

                   ‘सौदागर’ (1991)

घई की ही फिल्म ‘किसना’ में भी ‘वो किसना है…’ और ‘अहम् ब्रह्मास्मि…’ थे। आमिर खान वाली ‘लगान’ के दो गीत बेशक शानदार रहे।

                       ‘लगान’ (2001)

फिल्म के तीन प्रमुख पात्रों (आमिर खान, ग्रेसी सिंह और रशेल शैली) को कृष्ण, राधा और मीरा के तौर पर चित्रित करती इस कहानी में जन्माष्टमी के अवसर पर गाए जाने वाले ‘मधुबन में जो कन्हैया किसी गोपी से मिले…’ के अलावा लता मंगेशकर के गाए ‘ओ पालनहारे निर्गुण ओ न्यारे…’ को जावेद अख्तर की खूबसूरत शब्द रचना और ए.आर. रहमान के उतने ही खूबसूरत संगीत के लिए हमेशा याद किया जाता रहेगा।

हाल-फिलहाल के कृष्ण-गीत

सूरज बड़जात्या की ‘विवाह’ में रवींद्र जैन ने ‘राधे कृष्ण की ज्योति अलौकिक…’ जैसी उम्दा सवैया लिखी जो काफी पसंद की गई।

                      ‘देवदास’ (2002)

संजय लीला भंसाली की ‘देवदास’ के ‘काहे छेड़ छेड़ मोहे…’ और कमल हासन की ‘विश्वरूपम’ के ‘मैं राधा तेरी मेरा श्याम तू…’ को काफी पसंद किया गया और संयोग से इन दोनों ही गीतों की कोरियोग्राफी महान कथक नर्तक और गुरु पंडित बिरजू महाराज ने की।

                  पंडित बिरजू महाराज

‘ओह माई गॉड’ में अक्षय कुमार कृष्ण के रूप में दिखाई दिए और इस फिल्म में ‘गो गो गो गोविंदा…’ जैसे नए जमाने के साथ ताल मिलाते गाने के साथ मटकी फोड़ने का प्रसंग भी दिखाया गया।

                 ‘ओह माई गॉड’ (2012)

अब कहने को तो 2013 में आई दो फिल्मों-जैकी भगनानी वाली ‘रंगरेज’ और सचिन जोशी वाली ‘मुंबई मिरर’ में भी ‘गोविंदा आला रे…’ वाले गीत थे लेकिन न तो ये गीत और न ही ये फिल्में किसी को याद हैं। फिल्म ‘जोधा अकबर’ में भी ‘मनमोहना…’ जैसा प्यारा गीत आकर मन मोह लेता है।

               ‘जोधा अकबर’ (2008)

2017 में आई ‘बाहुबली 2’ में भी ‘कान्हा सो जा जरा…’ जैसा मीठा गीत सुनाई देता है। लेकिन यह भी सच है कि अब न तो वैसी भक्ति-फिल्में रहीं और न ही वैसे भक्ति-गीत, जो जनता के सिर चढ़ कर बोला करते थे। उदाहरण है अक्षय कुमार की फिल्म ‘टॉयलेट-एक प्रेम कथा’ जिसकी कहानी मथुरा की है और पूरी फिल्म में राधे-राधे का संबोधन भी। यहां तक कि बरसाने की प्रसिद्ध लट्ठमार होली का चित्रण और उस पर आधारित ‘गोरी तू लट्ठ मार…’ वाला गाना भी, लेकिन नहीं था तो कहीं भी कृष्ण-भक्ति का ज़िक्र और न ही उस पर आधारित कोई गीत।

बावजूद इसके हमारे फिल्म-संगीत के खजाने में संजो कर रखे हुए पुराने गीतों के दम पर ही सही, हर जन्माष्टमी पर घरों और मंदिरों में कृष्ण-भक्ति के गीत बजते हैं और बजते रहेंगे। बहरहाल, आप सबको MovieMirchi24 परिवार की तरफ से जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

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