गुरूदत्त शिवशंकर पादुकोण-फिल्म प्रेमियों को यह नाम कुछ अजीब लग सकता है। गुरूदत्त का पूरा नाम यही था। इस प्रतिभाशाली कलाकार को लंबा जीवन नहीं मिला। उनकी जीवन कहानी 1925 से 1964 तक ही सीमित है।

‘प्यासा’ (1957) उन्होंने 32 साल की उम्र में बनाई थी। आज भी इस फिल्म को देखकर आश्चर्य होता है। पचास के दशक में लोकप्रिय हिंदी सिनेमा की दो मुख्य धाराएँ थीं। राज कपूर और गुरूदत्त इन धाराओं के प्रतिनिधि थे। मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि राज कपूर इस दुनिया के फिल्मकार थे और गुरूदत्त दूसरी दुनिया के।

  राज कपूर और गुरूदत्त

ये दोनों ही निर्देशक कुशल अभिनेता ही नहीं थे बल्कि फिल्म के सभी हिस्सों की गहरी जानकारी भी रखते थे। फिल्म इतिहास के ‘क्रेडिट टाइटल्स’ के अनुसार राज कपूर ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के डायरेक्टर नहीं थे और गुरूदत्त ‘साहब, बीवी और गुलाम’ के डायरेक्टर नहीं थे, लेकिन इन दोनों ही फिल्मों पर इन्हीं के डायरेक्शन की छाप है।

गुरूदत्त की शुरूआती ट्रेंनिंग प्रभात स्टूडियो में हुई थी जहाँ उन्हें फिल्म को एक समग्र कला के रूप में समझने का मौका मिला। बल्कि वे प्रसिद्ध नर्तक उदयशंकर के नृत्य स्कूल में बाकायदा प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके थे। शुरू में उन्होंने ‘हम एक हैं’ फिल्म में डांस डायरेक्टर का काम भी किया।

एक अभिनेता के रूप में गुरूदत्त की एक खास तरह की रोमांटिक और ‘दूसरी दुनिया’ से जुड़ी छवि है। बराबर लगता है कि वे जिस दुनिया में फँसे दिखाई पड़ रहे हैं दरअसल वे उस दुनिया के हैं नहीं। फिर चाहे पर्दे पर वह एक असफल कवि की भूमिका निभा रहे हों या एक कामयाब फिल्म डायरेक्टर की। इन दोनों भूमिकाओं (‘प्यासा’ और ‘कागज के फूल’) में गौर करने की बात यह है कि सफलता में असफलता का अँधेरा है और असफलता में सफलता की एक अलग किस्म की चमक।

‘प्यासा’ में गुरूदत्त असफल कवि विजय के रूप में सामने आए हैं जो मृत्यु के बाद ही जैसे सफल होने के लिए अभिशप्त है। वह वास्तव में नहीं मरता है। जीवित है पर उसे मृत समझ लिया गया है। उसके ‘मरते’ ही उसकी किताबें छपती हैं, धड़ाधड़ बिकती हैं और उसकी स्मृति में बड़े-बड़े आयोजन होते हैं।

‘प्यासा’ में विजय की शोक सभा का दृश्य

‘प्यासा’ की कहानी में फिल्मी किस्म की अतिरंजना भी है लेकिन विजय के किरदार में बीसवीं सदी की एक संवेदनशील दुनिया की पीड़ा छिपी हुई है जिसकी परछाई हम चित्रकला में मोदिग्लियानी से लेकर साहित्य में मुक्तिबोध तक देख सकते हैं। इस दुनिया में मृत्यु के बाद रचनाकार को अधिक महत्त्व मिलता है।

अतिरंजना ‘कागज के फूल’ में भी है। उसका नायक एक अत्यंत सफल फिल्म निर्देशक सुरेश सिन्हा है। उसने एक अमीर घर की बेटी से विवाह किया पर पत्नी से लेकर ससुर तक फिल्मी दुनिया को घटिया धंधा मानते हैं। एक बेटी है जिसे पिता से मिलने नहीं दिया जाता है। लेकिन यह सफल फिल्म निर्देशक गुमनामी और गरीबी में एक दिन स्टूडियो में निर्देशक की कुर्सी पर ही मृत पाया जाता है।

‘कागज के फूल’ का एक दृश्य

सुरेश सिन्हा का यह असफल अंत बहुत तार्किक नहीं है। लेकिन गुरूदत्त ने विजय और सुरेश को एक ही सिक्के के दो पहलू में बाँटकर अपने समय में कलाकार की स्थिति, त्रासदी और नियति को एक आश्चर्यजनक सिनेमाई भाषा दी है।
अक्सर जो फिल्म दर्शकों द्वारा अस्वीकृत की जाती है वह कलाकार की बेहतर अभिव्यक्ति होती है।

‘प्यासा’ और ‘कागज के फूल’ दोनों बहुत निजी किस्म की (एक अर्थ में आत्मकथात्मक भी) फिल्में हैं। ‘प्यासा’ सफल हुई पर वह एक बेहतर फिल्म भी है। ‘कागज के फूल’ असफल हुई और कुछ बेहतरीन प्रसंगों के बावजूद वह तुलनात्मक रूप से एक कमजोर फिल्म है।

बड़े धूल भरे स्टूडियो का अँधेरा और रोशनी इस फिल्म को अद्भुत विजुअल अनुभव में बदलती है। पर कलाकार के एक वक्तव्य के रूप में ‘प्यासा’ अधिक प्रामाणिक और पक्की फिल्म है। और इन दोनों फिल्मों में गुलाब (प्यासा) और शांति (कागज के फूल) की भूमिका में वहीदा रहमान की उपस्थिति भी विजय और सुरेश को एक प्रकार की पूर्णता देती है।

‘कागज के फूल’ में वहीदा के साथ गुरूदत्त

वहीदा के आकर्षक व्यक्तित्व (जिसका आकर्षण उसकी सादगी में है) के बिना गुरूदत्त का कवि-फिल्मकार रूप जैसे अधूरा रह जाता है। मतलबी और सतही सफलता की दुनिया इस कवि-फिल्मकार को खारिज कर रही है-सिर्फ गुलाब (वेश्या) और शांति (अनाथ लड़की) उसे समझ पा रही है।

‘प्यासा’ में जॉनी वाकर एक चंपी तेल मालिश करने वाले दोस्त की भूमिका में विजय की ही एक छवि को अर्थ देते हैं जबकि ‘कागज के फूल’ में जॉनी वाकर को एक अमीर बाप का बिगडै़ल बेटा बनाकर गुरूदत्त ने गलती की। गुरूदत्त सिक्के का दूसरा पहलू बन सके लेकिन जॉनी वाकर नहीं।

पर आज गुरूदत्त की फिल्मों को देखकर सुखद आश्चर्य होता है कि एक व्यावसायिक ढाँचे में वह अपने भीतर के कवि को अभिव्यक्त कर सके।

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