ए फॉर एप्पल, बी फॉर बॉल, सी फॉर… सिनेमा…? या फिर सी फॉर क्रिकेट…? अंग्रेजी के एक ही अक्षर से शुरू होने वाले ये दोनों तमाशे भले ही मनोरंजन की भरपूर खुराक परोसने का दावा करते हों लेकिन एक सच यह भी है कि सिनेमा और क्रिकेट जब भी एक-दूसरे से आमने-सामने आकर टकराए हैं तो ज्यादा नुकसान हर बार सिनेमा को ही पहुंचा है। 30 मई से क्रिकेट वर्ल्ड कप का आगाज हो रहा है। ऐसे में आइए हम जायजा लेते हैं, क्रिकेट बनाम फिल्मों के मुकाबले में कौन जीत का सेहरा पहनता है और किसके चेहरे हार से गमगीन होते हैं।

क्रिकेट मैचों के दौरान बड़ी फिल्मों की रिलीज टालना फिल्म इंडस्ट्री का पुराना शगल रहा है। लेकिन इस बार के क्रिकेट वर्ल्ड कप मैचों में कई बड़ी फिल्में आ रही हैं। भारत, कबीर सिंह, आर्टिकल 15 जैसी फिल्में मिसाल हैं।तो क्या अब सिनेमा ने क्रिकेट से खौफ खाना छोड़ दिया है?

सच्चाई यह है कि सिनेमा की दीवानगी भले ही कितनी भी हो मगर वह बुखार में तब्दील इसलिए नहीं हो पाती क्योंकि फिल्में सदाबहार है। नई फिल्मों ने तो हर शुक्रवार को आना ही है जबकि क्रिकेट कभी-कभार आने वाले उस बुखार का रूप ले लेता है जो आकर दूसरी आम चीजों को दरकिनार कर देता है। यही वजह है कि क्रिकेट के मुकाबले शुरू होते हैं तो फिल्म वाले पहले ही परहेज बरतते हुए अपनी बड़ी फिल्मों की रिलीज को थाम देते हैं। इस बार भी संजय लीला भंसाली के प्रोडक्शन की फिल्म ‘मलाल’ जिससे जावेद जाफरी के बेटे मीजान का डेब्यू हो रहा है और प्रभुदेवा और तमन्ना भाटिया की हॉरर ड्रामा ‘खामोशी’ की रिलीज डेट वर्ल्ड कप के शुरुआती बुखार को देखते हुए अचानक आगे बढ़ा दी गई है।

पहले भी वर्ल्ड कप के दौरान ऐसा ट्रेंड रहा है। लेकिन कुछ साल पहले जब भारत में आई.पी.एल. मैच शुरू हुए तो उनके प्रति लोगों की दीवानगी देखते हुए भी फिल्मों ने अपने पैर पीछे खींचे थे। इधर आई.पी.एल. का असर धुंधला हुआ है मगर इस साल वर्ल्ड कप के आने से फिल्म वाले फिर डरे हुए हैं।

हालांकि मानी हुई बात है कि अच्छी फिल्म चाहे जब आए, उसे सराहा ही जाता है। लेकिन जान-बूझ कर क्रिकेट के सामने छाती खोल कर खड़े होना कई फिल्मों के लिए घाटे का सौदा भी रहा। बतौर डायरेक्टर अपनी पहली फिल्म ‘लाहौर’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाले  संजय पूरण सिंह चौहान भी इसे स्वीकारते हुए कहते हैं कि हर कोई अपनी फिल्म को ‘सेफ पीरियड’ में लाना चाहता है और अगर उनका बस चला होता तो वह भी ‘लाहौर’ को आई.पी.एल. के बीच में कभी न लाते।

फिल्म ‘लाहौर’ का पोस्टर

ऐसा बहुत बार देखा गया कि क्रिकेट और सिनेमा की टकराहट में क्रिकेट की ही चौधराहट रही। यही कारण है कि क्रिकेट के सीज़न में देश के कई शहरों में बार, लाऊंज और रेस्टोरेंट्स के साथ-साथ कई मल्टीप्लेक्स थिएटरों में भी फिल्मों की बजाय क्रिकेट मैच दिखाए जाने लगे हैं। दिल्ली के जी3एस सिनेमा के जनरल मैनेजर सतीश गर्ग का कहना है कि यह प्रयोग भी हालांकि नुकसान ही दिलाता है फिर भी इन दिनों खाली पड़े थिएटर के मालिक क्रिकेट के बहाने ही अपने यहां रौनक बढ़ाने की कोशिश करते रहते हैं।

क्रिकेट के चलते सूखे पड़े मैदान में उतरने का जोखिम उठाकर कई फिल्मों ने कामयाबी का सेहरा भी पहना है। 2011 में ‘तनु वैड्स मनु’ ने क्रिकेट मैचों के बीच रिलीज होकर बॉक्स ऑफिस के तमाम समीकरणों को झुठलाते हुए शानदार कामयाबी दर्ज की थी। कुछ ऐसा ही जोखिम निर्माता वाशु भगनानी ने 1999 में तब उठाया था जब उन्होंने अपनी फिल्म ‘बीवी नं.1’ को ऐन वर्ल्ड कप क्रिकेट मैचों के बीच में रिलीज किया था। पर तब तक भारत की टीम मुकाबले से बाहर हो चुकी थी और वाशु का कहना था कि लोग अब फिर से फिल्मों का रुख करेंगे।

ठंडे पड़े बाजार में आई उनकी इस फिल्म ने गर्म चोट की और उस साल की सबसे बड़ी हिट भी साबित हुई। सुभाष घई की फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी मुक्ता मूवीज के उत्तर भारत के प्रभारी संजय घई कहते हैं कि फिल्म अगर अच्छी हो तो अपना रास्ता बना ही लेती है और यही इस फिल्म के साथ भी हुआ था। फिल्म ट्रेड एनालिस्ट विनोद मिरानी का कहना है कि यह दरअसल एक बहुत बड़ी गलतफहमी है कि क्रिकेट आएगा तो सिनेमा को खा जाएगा क्योंकि हर कोई तो क्रिकेट देखता नहीं है और न ही क्रिकेट का हर मुकाबला देखने लायक होता है।

बीते बरसों में ‘हाऊसफुल 2’, ‘विकी डोनर’, ‘इश्कजादे’ जैसी फिल्मों की कामयाबी ने साबित किया है कि फिल्म अच्छी हो तो क्रिकेट हौवा नहीं बन पाता। लेकिन आई.पी.एल. के मुकाबले वर्ल्ड कप का कद बड़ा होता है।

हालांकि इसके बावजूद इस साल 30 मई से शुरू होकर डेढ़ महीने तक (30 मई-14 जुलाई) चलने वाले क्रिकेट मैचों के दौरान सबसे पहले तो सलमान खान की ‘भारत’ खम ठोक रही है।

वैसे यह फिल्म रमजान के बाद वाली मीठी ईद पर आ रही है जो सलमान की फिल्मों का पसंदीदा और लकी हॉट-स्पॉट होता है। लेकिन अगर यह हिट होती है तो क्रिकेट मैचों के दौरान सिनेमा को झटका लगने के मिथ का टूटना तय है।

इसके बाद शाहिद कपूर की ‘कबीर सिंह’ और अनुभव सिन्हा की आयुष्मान खुराना वाली ‘आर्टिकल 15’ का इन दिनों में आना इनका दुस्साहस ही कहा जाएगा।

वैसे इन 45 दिनों में फिल्में बहुतेरी आएंगी लेकिन वे ‘गेम ओवर’, ‘वन डे-जस्टिस डिलीवर्ड’ जैसी छोटी फिल्में होंगी या फिर ‘द जोया फैक्टर’ जैसी वह फिल्म जिसकी कहानी में ही क्रिकेट है। कह सकते हैं कि अगर फिल्म वालों के मन में डर न होता तो ‘जबरिया जोड़ी’, ‘पल पल दिल के पास’, ‘मैंटल है क्या’ वर्ल्ड कप के बाद भला क्यों आतीं?

लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भारत, कबीर सिंह और आर्टिकल 15 जैसी फिल्में भी पेश करती हैं। और ताजा ख़बर मिली है कि ऋतिक रोशन की ‘सुपर 30’ कई रिलीज डेट बदलने के बाद अब 12 जुलाई को रिलीज होने जा रही है। यानी फाइनल मैच के ठीक दो दिन पहले।

हालांकि 9 और 11 जुलाई को वर्ल्ड कप के दोनों सेमीफाइनल मैच हो चुके होंगे। लेकिन रिलीज के दो दिन बाद फाइनल मैच का भूत मुसीबत खड़ी कर सकता है। खासकर, अगर भारत की टीम फाइनल खेल रही हो। हालांकि वह देश में जश्न का माहौल होगा। और हम दुआ करते हैं कि ऐसा हो।

यानी कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि अगर यह सच है कि फिल्म शानदार हो तो जरूर चलती है, तो यह भी उतना ही सच है कि जब क्रिकेट का वायरल बुखार चढ़ता है तो फिर लोगों को कुछ और नहीं सूझता। इसीलिए अगर फिल्म वाले बड़ी फिल्मों की रिलीज़ से बचते हुए फूंक-फूंक कर छाछ पीते हैं तो भला अचरज कैसा?

 

 

 

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