स्मिता पाटील की टी. वी. पर खबरें पढ़ने के काम से शुरू होकर ‘सुबह’ तक की यात्रा दिलचस्प और मुश्किल है। अरूण खोपकर ने पुणे के फिल्म संस्थान की अपनी डिप्लोमा फिल्म में स्मिता की मदद ली। श्याम बेनेगल ने इस तरह से स्मिता को खोजा।

‘निशांत’, ‘मंथन’ आदि फिल्मों ने स्मिता को एक पहचान दी लेकिन ‘भूमिका’ में मराठी अभिनेत्री हंसा बडकर के जीवन को सिनेमा के पर्दे पर उतारने की चुनौती ने स्मिता को एक बड़ी अभिनेत्री साबित कर दिया। बेनेगल की दूसरी फिल्मों को चर्चा भले ही ज्यादा मिली हो लेकिन मेरी नजर में ‘भूमिका’ उनकी सर्वश्रेष्ठ फिल्म है और इस फिल्म में स्मिता का अभिनय अद्भुत है। स्मिता को ‘भूमिका’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। बाद में ‘चक्र’ में भी उन्हें दूसरा राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

‘भूमिका’ के एक दृश्य में स्मिता पाटिल

एक अभिनेत्री के रूप में स्मिता की क्षमता को समझने के लिए ‘भूमिका’, ‘बाजार’ और ‘सुबह’ इन तीन फिल्मों के उदाहरण लिए जा सकते हैं। स्मिता ने ‘सुबह’ को अपनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म माना था-शायद इसलिए भी कि उसमें सावित्री महाजन स्त्री के रूप में अपनी सच्ची ताकत को दिखाने में सफल हुई है। स्त्रियों की स्वतंत्रता और ताकत को उन दिनों चालू फिल्मों में भी धड़ल्ले से दिखाया गया। लेकिन ‘सुबह’ में स्मिता पाटील ने सावित्री के चरित्र को सुंदर अर्थ दिया है। स्क्रिप्ट और डायरेक्शन (जब्बार पटेल) ने भी इस काम में स्मिता की पूरी मदद की है।

‘बाजार’ ने स्मिता के अभिनय की रेंज को साबित किया। हैदराबाद के मुस्लिम वातावरण को आधार बनाने वाली इस फिल्म में स्मिता ने एक नए यथार्थ को प्रस्तुत किया और यह यथार्थ गिलास में बढ़िया व्हिस्की का पेग उँड़ेलने के प्रसंग तक में उभरता है।

फ़िल्म ‘बाज़ार’ में स्मिता पाटिल

 

ये तीनों फिल्में काफी हैं स्मिता को बड़ी अभिनेत्री सिद्ध करने के लिए। इनमें ‘भूमिका’ सर्वश्रेष्ठ लगती है चूँकि उसमें निर्देशन और अभिनय का दुर्लभ मेल है। सुप्रसिद्ध स्वीडी फिल्मकार बर्गमैन अपनी फिल्मों में अभिनेत्रियों के साथ अक्सर इस तरह का मेल दिखाते हैं।

‘भूमिका’ का रोल मुश्किल भी है-‘सुबह’ का रोल तो बहुत सहज है। उसमें सीपिया रंग के अतीत में जाकर स्मिता एक पुराने जमाने की अभिनेत्री भी नजर आती हैं। संभवतः स्मिता को ‘सुबह’ में सावित्री की भूमिका इसलिए भी पसंद थी कि वह सामाजिक जीवन में उस तरह के काम करने की कोशिश करती रहीं, जो स्त्री को पुरूष प्रधान समाज में अपनी जगह दिलाएँ।

स्मिता और शबाना की तुलना स्वाभाविक है। उन दिनों इन दानों के बयानों ने और ‘अर्थ’ और ‘मंडी’ इन दो फिल्मों ने इस तुलना को और भी तीखा विषय बना दिया था। ‘अर्थ’ में शबाना की भूमिका वैसे भी दर्शक के मन में सहानुभूति पैदा करती है। दूसरी औरत (जो लगभग मानसिक रोगी भी है) के रूप में स्मिता वहाँ खलनायिका है। लेकिन ‘अर्थ’ में यह डायरेक्टर की कमजोरी है कि उसने स्मिता के चरित्र को हॉलीवुड की अभिनेत्री सरीखा बना दिया है। जिस घर में स्मिता रहती है उसका डिजाइन तक भारतीय नहीं है।

फिर भी स्मिता ने इस भूमिका की चुनौती को जगह-जगह पर स्वीकार किया है। ‘मंडी’ में जरूर शबाना स्मिता को पीछे छोड़ देती है। लेकिन ‘मंडी’ पूरी तरह से शबाना केंद्रित फिल्म है। जीनत (स्मिता) का काम तो सिर्फ सजे-धजे बैठे रहना है।

शबाना और स्मिता बहुत अलग किस्म के वातावरण की पैदाइश हैं। शबाना एक संस्कृति संपन्न वातावरण से रहीं। शुरू से ही उनमें आत्मविश्वास है। 1973 में मुंबई में फिल्म संस्थान की डिप्लोमा फिल्मों को देखकर ही लगा था कि शबाना आजमी बहुत तेज तर्रार और सफल अभिनेत्री साबित होंगी, बल्कि एक डिप्लोमा फिल्म में तो वह बहुत ‘मॉड’ शैली में अंग्रेजी में अपना परिचय देती हैं कि मैं शबाना आजमी हूँ।

स्मिता के बचपन का वातावरण दूसरी तरह का रहा है। उनके पिता मंत्री रह चुके थे। मराठी वातावरण में वह पली-बढ़ीं। अंग्रेजी बोल नहीं पाती थीं। निजी भावनात्मक जीवन शुरू से ही उनका तनावपूर्ण रहा। एक पत्रकार से एक बार स्मिता ने कह दिया था, ‘मैं शायद ज्यादा दिन जिंदा न रहूँ।’

स्मिता के इस निराशावाद को खासतौर पर उनके अभिनय के मिजाज से जोड़कर देखा जाना चाहिए। एक बार उन्होंने एक पत्रकार से कह दिया था- मैं मोमबत्ती के दोनों सिरों को जला रही हूं। और उनके जीवन के दुखद अंत ने इस बयान को अनजाने में ही सच साबित कर दिया था।

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