महान जापानी फिल्मकार अकीरा कुरोसावा (1910-98) ने अपनी 30वीं और अंतिम फिल्म ‘मादादायो’ (नॉट यट) में बुजुर्ग प्रोफेसर उशिदा के माध्यम से एक ऐसे व्यक्ति को पर्दे पर प्रस्तुत किया है जो ‘दूसरी दुनिया’ में जाने के लिए तैयार नहीं है। वह प्रोफेसर अपने अध्यापन के काम को छोड़ देता है ताकि लिखने-पढ़ने को अधिक समय दे सके।

द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम वर्षों का वातावरण है। तोक्यो शहर जल रहा है। प्रोफेसर उशिदा अपनी पत्नी के साथ लगभग एक संन्यासी का जीवन जी रहा है। उसके स्टूडेंट्स मिलकर उसका घर बना देते हैं। हर साल ये स्टूडेंट्स मिलकर अपने प्रोफेसर का जन्मदिन मनाते हैं।

धीरे-धीरे समय बीतता है। इन स्टूडेंट्स के बच्चे भी इन दावतों में आना शुरू कर देते हैं। हर दावत में प्रोफेसर से सवाल किया जाता है कि क्या वह ‘दूसरी दुनिया’ में जाने (यानी मृत्यु) के लिए तैयार है? प्रोफेसर उशिदा का छोटा-सा जवाब इन स्टूडेंट्स को हर बार सुनने को मिलता है-‘अभी नहीं’।

यह फिल्म 1992 में बनी थी और 93 में रिलीज हुई थी। तब कुरोसावा ने फिल्म-डायरेक्शन की दुनिया में पचास साल पूरे कर लिए थे। शायद ‘मादादायो’ के जरिए कुरोसावा जीवन के गहरे मानवीय मूल्यों में अपनी आस्था को और भी अधिक मजबूत करना चाह रहे थे।

सब कुछ जल चुका है। लेकिन जीवन को बचाने की अर्थपूर्ण कोशिशें जारी हैं। मनुष्य अपनी हार नहीं मान लेना चाहता। ‘इकिरू’ (1952) में कुरोसावा ने एक ऐसे अधेड़ अफसर की कहानी पेश की थी जिसे कैंसर हो जाता है। उसे बता दिया जाता है कि तुम्हारे पास जीने के लिए सिर्फ छह महीने रह गए हैं।

यह अधेड़ अचानक अपनी निराशा के अँधेरे से बाहर आने का फैसला करता है। वह अपनी व्यर्थ जिंदगी के अंतिम दिनों में कुछ सार्थक काम करना चाहता है। और एक सार्थक जीवन के संपर्क में आते ही इस व्यक्ति को इस बात का तीखा और त्रासद एहसास होता है कि पिछले 25 सालों से मैं जी कहाँ रहा था। मैं तो एक शव की तरह था। जीवन तो बस मैं अब जी रहा हूँ।

कुरोसावा की प्रतिष्ठा आमतौर पर ‘पीरियड’ (अतीतमुखी) फिल्मों के कारण है। पर ‘मादादायो’ या ‘लिविंग’ कंटेंपररी फिल्में हैं। मनुष्य के भीतर की अच्छाई को ये फिल्में मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती हैं। मुश्किल से मुश्किल हालात में भी ये जीवन के पक्ष में खड़े रहने का संदेश देती हैं।

निजी जीवन में कुरोसावा ने एक बार आत्महत्या करने की कोशिश की थी। उनकी कद काठी लगभग एक ‘सामुराई’ (परंपरागत जापानी योद्धा) की तरह की थी। दरअसल वह सामुराई वंश के ही थे। उनका एक ‘शाही’ अंदाज था। उनका मिजाज मुश्किल माना जाता था। फिल्म निर्माण संबंधी उनकी ‘माँगें’ काफी सख्त किस्म की साबित होती थीं।

तरह-तरह के किस्से (सच्चे-झूठे) कुरोसावा के नाम से जुड़े रहे हैं। लेकिन कुरोसावा ने अपनी निजी जटिल भावनात्मक कठिनाइयों से लड़ाई लड़ी, अपनी ‘ड्रिंकिंग’ की समस्या को सुलझाया, आत्महत्या (जापान में जिसकी एक दूसरी ही परंपरा रही है) के अँधेरे से मुक्ति पाई और 88 सालों का एक भरा-पूरा जीवन जिया। और इतनी अच्छी फिल्में बनाईं।
कुरोसावा के शरीर में एक ‘सामुराई’ का रक्त था। एक सामुराई के सपने भी थे और सामुराई होने की नियति और दुःस्वप्न से भी उन्हें हमेशा जूझना पड़ा।

कुरोसावा शुरू में एक चित्रकार बनना चाह रहे थे। उनके एक बड़े भाई बड़े प्रतिभाशाली थे। मूक फिल्मों की कल्पनाशील कमेंट्री के लिए वह मशहूर थे। उन्होंने ही कुरोसावा को अनेक महान फिल्में देखने के लिए प्रेरित किया। पर इस भाई ने छोटी उम्र में ही अचानक आत्महत्या कर ली।

कुरोसावा इस त्रासदी से अपने को कभी पूरी तरह मुक्त नहीं कर पाए। उन दिनों आर्थिक मंदी का दौर था। कुरोसावा के लिए चित्रकारी का जीवन मुश्किल हो गया था। एक रंग की ट्यूब खरीदने के पैसे जुटाना भी एक चुनौती बन जाती थी।

घर की गरीबी को देखते हुए कुरोसावा ने एक फिल्म कंपनी के विज्ञापन को पढ़कर अपनी एप्लीकेशन भेज दी। विज्ञापन में एक निबंध की भी माँग की गई थी। इस निबंध का विषय था-जापानी फिल्मों की बुनियादी कमजोरियाँ गिना कर उन्हें दूर करने के रास्ते बताइए।

कुरोसावा ने अपने निबंध में कुछ परिहासभाव से यह तर्क दिया कि अगर ये कमजोरियाँ ‘बुनियादी’ हैं, तो उन्हें कभी भी दूर नहीं किया जा सकता है। कुरोसावा को फिल्म निर्माण के क्षेत्र में नौकरी मिल गई। फिल्म कला को इस तरह से उसका शेक्सपीयर मिल गया। हॉलीवुड के स्पीलबर्ग जैसे फिल्मकार ने कुरोसावा को शेक्सपीयर का दर्जा दिया है।

अपनी आत्मकथा में कुरोसावा ने चित्रकला छोड़ने के फैसले के पीछे एक दिलचस्प रचनात्मक कारण भी बताया है। उनका कहना है कि जब मैं किताबों में वान गॉग या सेजां जैसे किसी बड़े चित्रकार की कलाकृतियाँ देखता था, तो बाहर की दुनिया मुझे उन चित्रों जैसी ही नजर आने लगती थी। वान गॉग की एक पुस्तक देखी और पढ़ी और बाहर के घर, पेड़, सड़कें कुरोसावा को इन कलाकृतियों की तरह दिखने लगती थीं। कुरोसावा को रचनात्मक भय सा होने लगा कि मेरे पास एक चित्रकार की अपनी मौलिक प्रतिभा और दृष्टि नहीं है।

गौर करने की बात यह है कि बरसों बाद दुनिया के एक मास्टर फिल्मकार के रूप में प्रतिष्ठित होने के बावजूद कुरोसावा ने लिखा कि आज भी मेरे पास पूरी तरह से चीजों को व्यक्तिगत और विशिष्ट ढंग से देखने वाली दृष्टि का अभाव है।
क्या इस कथन के पीछे विनम्रता है? क्या यह एक आत्मस्वीकृति है? इस सवाल के जवाब को जानने के लिए हमें कुरोसावा की अपनी फिल्म की परिभाषा और सवाल पर ध्यान देना होगा।

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