रोज़ के इतने शोर और भागदौड़ भरी ज़िंदगी में लिखना अपने आप में सबसे मुश्किल, लोनली और हॉंटेड काम है।  ऊपर से, ऐसे वक़्त में जहाँ सबके पास विचार हैं, आइडिया है, अपनी कहानी बोलना और लोगों से शेयर करना किसी भी फ़िल्म लेखक के लिए हमेशा से मुश्किल रहा है।  सचमुच ये किसी मंज़िल के एक पड़ाव तक पहुँचने जैसा है।  पर ये सफ़र होता कैसा है, ये अपनी तरह से काम करने वाला कोई लेखक ही बयाँ कर सकता है।  संजीव ऐसे ही लेखक है, जिनकी पहली फ़ीचर फ़िल्म इस साल रिलीज़ होने जा रही है।

संजीव का बचपन बिहार के छोटे से गांव में बीता। बारहवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे दिल्ली पहुंचे। वहां हिंदी लिटरेचर में ग्रेजुएशन करने के बाद कविता, कहानी लिखते हुए उन्होंने माया नगरी का रुख किया। ‘प्यार तूने क्या किया’, ‘कोड रेड’, ‘क्राइम पेट्रोल’, ‘गुमराह’ जैसे शोज़ से स्टोरी-स्क्रिप्ट लिखने की शुरुआत की। “जबरिया जोड़ी” संजीव की लिखी पहली फ़िल्म होगी। इस फिल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा और परिणीति चोपड़ा लीड रोल में नजर आएंगे। यह फिल्म बिहार में किडनैपिंग के बाद जबरदस्ती करवाई जाने वाली शादी पर बेस्ड एक लव स्टोरी है।  आइए, संजीव के. झा से जानते हैं फिल्म की कहानी उनके जेहन में कैसे आई, कहां से की उन्होंने शुरुआत और कैसा रहा उनका बिहार से माया नगरी का सफर?

संजीव जी, सबसे पहले आप अपने बैकग्राउंड के बारे में हमें बताएं ?

मैं बेसिकली बिहार के मोतिहारी जिले का रहने वाला हूं। 2005 में मैं दिल्ली आ गया था और जामिया यूनिवर्सिटी से मैंने हिंदी लिटरेचर में ग्रेजुएशन पूरा किया। ग्रेजुएशन पूरा होने के बाद साल 2008 में मैंने एफटीआईआई में स्क्रीनप्ले कोर्स में एडमिशन लेने की कोशिश की लेकिन मेरा एडमिशन नहीं हो पाया। देखिए मेरा मानना है कि सिनेमा में प्रवेश करने के दो रास्ते होते हैं,  पहला है फ़िल्म स्कूल से पढ़कर आओ, ताकि सिनेमा और राइटिंग के ग्रामर और क्राफ़्ट की समझ पहले से बनी रहे। या फिर खुद पढ़ो और खुद ही सिनेमा के पास पहुंच जाओ। मेरा रास्ता दूसरा वाला रहा।  सेल्फ़ मेड टाइप।

जब दो-दो बार विफल हुआ तो मैंने मुंबई जाने का फैसला किया और साल 2011 में बोरिया बिस्तर बांधकर मुंबई आ गया। मुंबई आने के बाद मेरा पहला काम सामने आया निर्माता विकास गुप्ता के शो “प्यार तूने क्या किया” और “कोड रेड” में।  उनकी कम्पनी “लॉस्ट बॉय” के लिए मैंने काफ़ी कुछ लिखा और उसी से सर्वाइव किया।

आपको अपनी पहली फिल्म जबरिया जोड़ी कैसे मिली ?

फ़िल्म मिली या किसी ने लिखने को दी, ऐसा मेरे साथ कभी नहीं हुआ। पहले मैं लिखता हूँ, फिर उस कहानी को दर्शकों तक पहुँचाने के लिए मेरी जद्दोजहद शुरू होती है। जब मुंबई आया था तो मैं असिस्टेंट डायरेक्टर की नौकरी खोज रहा था और दो जगह मैंने जॉइन भी किया था लेकिन जिस भी फिल्म से मैं जुड़ रहा था वो फिल्में बंद हो जा रही थीं। इस बीच लिखना-पढ़ना तो चल ही रहा था। लेकिन जब करने को कुछ नहीं रहा, ना नौकरी ना दोस्ती। तो मैंने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया, क्योंकि कहानियों का निर्माण एकांत में ही होता है, कॉफ़ी शॉप में झूठी मीटिंग्स हुआ करती है।

साल 2014 और 15 में मैंने जबरिया जोड़ी के आईडिया को डेवेलप किया और फिर किसी ऐसे इंसान की खोज में लग गया जो मेरी इस कहानी को लोगों के सामने ढंग से पेश कर सके। मैंने कई लोगों से बातचीत की, उनसे मिला, अपने विचार शेयर किए, और इसी सिलसिले में मैं प्रशांत सिंह, जो कि इस फ़िल्म के डायरेक्टर हैं से मिला।

फिर हमने ये कहानी आनंद एल राय को सुनाई। वो इस क़िस्म की कहानियों को बहुत ही शिद्दत से पेश करते हैं। जैसे कोई बच्चे को गोद लेकर उसे पालता है, उसमें सौंदर्य और संस्कार भरता है। प्रशांत उनके असिस्टेंट भी थे, तो मैं भरोसा कर सकता था कि ये मेरे विचारों से वास्ता रखेंगे, उसे समझेंगे। फिर हम शैलेश आर. सिंह से मिले और जर्नी शुरू हो गयी।

आपने टेलीविजन के लिए काम किया है। ऐसे में फ़िल्म के लिए लिखना कितना अलग  है ?

मुझे लगता है टेलीविजन और फ़िल्मों में सिर्फ मीडियम का फर्क है। मुझे कुछ अलग नहीं लगा क्योंकि मैंने टेलीविजन में जितना भी काम किया है वो काम भी फिल्मों के काम की ही तरह था। एपिसॉडिक लिखता था, तो हर एपिसोड में एक पूरी कहानी ही कहनी होती है। उसी क्राफ़्ट के साथ, जिसके साथ फ़िल्म के लिए लिखा जाता है।

डेली सोप में आपको रोज लिखना होता है और प्लॉट को भी तोड़ना-मरोड़ना पड़ता है क्योंकि आपको हर रोज़ दर्शकों को कुछ नया देना है, उन्हें रोके रखना है। लेकिन टेलीविजन में भी आपको किरदार के बारे में लिखना होता है, जानना होता है और फ़िल्में भी किरदार को ध्यान में रखकर लिखी जाती हैं, इसलिए मुझे कुछ खास फर्क नहीं नजर आता। नॉवल और प्ले अलग हैं।

स्क्रिप्ट लिखने के बाद एक स्क्रिप्ट राइटर की भूमिका कहाँ खत्म हो जाती है ?

सच कहूं तो यह डायरेक्टर पर निर्भर करता है। अगर डायरेक्टर को आपकी जरूरत होगी तो वो आपको साथ रखेगा। आमतौर पर जब एक बार फिल्म शुरू हो जाती है तो डायरेक्टर राइटर को अपने साथ नहीं रखता है…हालाँकि ऐसा होना नहीं चाहिए। ख्वाजा अहमद अब्बास और राजकपूर साब के साथ ऐसा नहीं था। राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी के साथ ऐसा नहीं है। आनंद एल. राय और हिमांशु शर्मा या सुजित सरकार और जूही चतुर्वेदी के साथ भी ऐसा नहीं है। सेट को मारिए गोली, वो दिल से जुड़े रहते हैं, इसलिए क्रिएट कर पाते हैं।

फिल्म जबरिया जोड़ी के बारे में बताएं ? फ़िल्म का टाइटल जबरिया जोड़ी क्यूँ है?

जबरिया जोड़ी दरअसल बिहार में प्रचलित पकडुआ विवाह पर आधारित एक रोमांटिक-कॉमडी है, जिसकी कहानी अभय सिंह नाम के एक दबंग लड़के और बबली यादव नाम की एक बोल्ड लड़की के इर्द-गिर्द घूमती है।

गन प्वाइंट मैरेज की पृष्ठभूमि में इन दो किरदारों का प्यार पनपता है और परवान चढ़ता है। लेकिन फ़िल्म का टोन ट्रैजिक न होकर लाइट है। लिखते हुए कोशिश की गई है कि फ़िल्म सीरीयस नहीं हो बल्कि मनोरंजक रहे ताकि दर्शक देखने आए और कुछ ना कुछ जानकारी भी लेकर जाए! फिल्म में आपको बिहार की बोली देखने को मिलेगी और बिहारी लैंग्वेज में कई डायलॉग भी सुनने को मिलेंगे।

जबरिया शब्द का इस्तेमाल स्क्रिप्ट में मैंने कई जगह किया था, वहीं से निकला टाइटल है। देशी शब्द है। ज़्यादातर लेखक फ़िल्म का टाइटल ख़ुद सजेस्ट करते हैं, लेकिन टाइटल के पीछे कई वजहें शामिल होती है। जिस तरह किसी किताब का कवर इम्पोर्टेन्ट रहता है और लोग अच्छा कवर  देखकर किताब एक बार उठाते ज़रूर है, वैसे ही फ़िल्म का टाइटल अपनी अहमियत रखता है।

फिल्म की कहानी को लेकर स्टारकास्ट का क्या रिएक्शन था ?

नरेशन के दौरान सिद्धार्थ और परिणीति दोनों को ही कहानी काफी पसंद आई थी। जो दुनिया हमने दिखाई, सुनाई उसमें उन्होंने ख़ुद को रोमांचित महसूस किया होगा, तभी हाँ की। कहानी अब स्टार्स के लिए अहम होती जा रही है। वो स्टोरी, आइडिया, स्क्रिप्ट इन सब के आधार पर हाँ या ना कर रहे हैं। कोई भी एक्टर टाइपकास्ट नहीं होना चाहता। वो अलग-अलग किरदार करना चाहता है, अलग अलग राइटर की कहानियों का हिस्सा बनना चाहता है।

आने वाले दिनों में क्या आप कोई फिल्म डायरेक्ट करेंगे ?

पता नहीं, लेकिन जब कभी कोई ऐसी कहानी मैं शेयर करना चाहूं और कोई उसमें यक़ीन ना करे, या उसे मुहब्बत ना दे, तो अपनी कहानी ख़ुद कहने में कोई हर्ज नहीं। “गली बॉय” में एमसी शेर मुराद को मना कर देता है। वो कहता है तेरी कहानी है तू ख़ुद बोल, मैं अपनी कहानी बोलता हूँ। और वहीं से मुराद के मुराद बनने की कहानी शुरू होती है।  मैं तो वैसे भी नहीं मानता कि फ़िल्म बनाने के लिए किसी डायरेक्टर  का असिस्टेंट होना ज़रूरी है। पूरी दुनिया में ऐसा कहीं नहीं है। अमेरिका से लेकर योरोप तक। सिनेमा का इतिहास देखिए, लोग लिखकर ही निर्देशक बनते हैं, या किसी के लिखे पर भरोसा करके, उसकी कहानी को अपनी कहानी समझ के। Director’s job is to get the right people and give them the right brief, that’s it।

आपकी पर्सनैलिटी काफी अच्छी है तो क्या कभी बड़े परदे पर आने का प्लान है ?

बिल्कुल भी नहीं क्योंकि मुझे लगता है कि एक्टिंग वाला टैलेंट मेरे अंदर नहीं है।  अभिनय एक बहुत ही मुश्किल विधा है, सिर्फ़ बॉडी बना लेना या मेकअप कर लेना, एक्टिंग नहीं होता। वहीं पान सिंह तोमर या हासिल या पीकू की जो लाइनें इरफ़ान साब जैसे बोल देते हैं, आप किसी और से बुलवा लीजिए, साधारण एक्टर उन लाइनों की पूरी पोयट्री ख़राब कर सकता है। कैमरे के सामने होकर कैमरा भूल जाने में ज़िंदगी बीत जाती है। मैं ऑथर या लेखक कहलाना पसंद करूँगा। रचनाकार निर्माण और विध्वंस करता है, वही ब्रह्मा है, विष्णु है, वही महेश है।

आगे क्या लिख रहे हैं ? अप्कमिंग प्रॉजेक्ट्स के बारे में बताएँ।

दो-तीन फ़ीचर फ़िल्मों की स्क्रिप्ट जो पहले ही पूरी कर ली थी, वो सब पिचिंग के लेवल पर हैं। मैं अपनी लिखी कहानियों को लेकर बहुत केयरिंग हूं। मैं उन्हें बरबाद होते नहीं देख सकता। तो वो शिद्दत से बने, इस कोशिश में हूं। दो वेब सीरिज़ पर काम करना शुरू किया है। वो लगभग ख़त्म है। फिर अपने ही परिवार की कहानी लिखना शुरू करूंगा, जो आज़ादी की लड़ाई में शामिल हुए। मेरे ग्रैंडफादर रमेशचंद्र झा की कहानी है। क्विट इंडिया मूवमेंट के बैक्ड्रॉप पर एक बागी की कहानी है। ये एक नॉवल होगा।

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