ब्लू, इंग्लिश-विंग्लिश, बॉस, तेवर, 102 नॉट ऑउट, डियर जिंदगी, हिंदी मीडियम जैसी हिट फिल्मों के सिनेमेटोग्राफर रह चुके लक्ष्मण उतेकर एक वक्त पर फिल्मों के सेट पर स्पॉटबॉय हुआ करते थे लेकिन आज वो किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। इन दिनों लक्ष्मण उतेकर अपनी पहली हिंदी फिल्म लुका छुप्पी को लेकर काफी चर्चा में हैं क्योंकि उनकी पहली ही फिल्म को ऑडियंस का काफी अच्छा रिस्पांस मिल रहा है। सिनेमेटोग्राफर से डायरेक्टर की कुर्सी पर बैठ चुके लक्ष्मण उतेकर के बारे के चलिए करीब से जानते हैं।
सबसे पहले अपने बारे में कुछ बताएं ?
मैं महाराष्ट्र के रायगढ़ जिला स्थित पोलादपुर शहर का रहनेवाला हूं। मैं जब सात साल का था तो मुंबई में आ गया था और अपने अंकल के घर पर रहता था। जब मैं सातवीं और आठवीं क्लास में था तो मैंने काम करना शुरू कर दिया था। मैंने अपने करियर की शुरुआत स्पॉटबॉय के काम से शुरू की थी। फिर धीरे- धीरे मैं थर्ड कैमरापर्सन बना फिर फर्स्ट पर्सन। फिर उसके बाद कैमरामैन और फाइनली सिनेमेटोग्राफर बन गया। अब फिल्में भी डायरेक्ट करने लगा हूं और लुका छुप्पी मेरी पहली हिंदी फिल्म है। इससे पहले मैं दो मराठी फिल्में भी डायरेक्ट कर चुका हूं।
आपके जेहन में सिनेमेटोग्राफर से डायरेक्टर बनने का खयाल कब और कैसे आया? 
मुझे कई बार ऐसा लगता था कि मुझे एक बार ही सही मगर किसी फिल्म को डायरेक्ट जरूर करना चाहिए। सिनेमेटोग्राफर की हैसियत से मैं वही करता आया हूं जो मुझे डायरेक्टर करने को कहता था, मुझे खुद भी ऐसा लगता था कि इसे ऐसे भी किया जा सकता है, लेकिन मैं अपनी राय नहीं रख सकता था इसलिए मैंने शुरुआत मराठी फिल्म को डायरेक्ट कर की। मैं इसलिए भी डायरेक्टर बना क्योंकि मुझे मेरे विजन से भी फिल्में बनानी थी।
अब जब आप खुद डायरेक्टर बन गए हैं, तो आज एक स्पॉटबॉय को किस नजर से देखते हैं? 
शायद आप यकीन ना करें मगर यह सच है कि मैं जितनी इज्जत फिल्म के स्टार और प्रोड्यूसर की करता हूं उससे भी ज्यादा स्पॉटबॉय की करता हूं। इसका कारण यह है कि कभी मैं खुद भी स्पॉटबॉय का काम कर चुका हूं। फिल्म बनाना एक टीम वर्क है। यह किसी एक इंसान का काम नहीं है। एक फिल्म बनने में जितना योगदान एक डायरेक्टर का होता है उतना ही योगदान एक स्पॉटबॉय का भी होता है क्योंकि वो भी शूटिंग शुरू होने से लेकर अंत तक सेट पर मौजूद रहता है।
आप एक गरीब परिवार से तालुक रखते हैं ऐसे में इस मुकाम पर पहुंचना कितना मुश्किल था ?
सच कहूं तो इस मुकाम तक पहुंचना बहुत मुश्किल था लेकिन इसका श्रेय मैं अपनी फैमिली को दूंगा क्योंकि अगर उनका साथ नहीं होता तो मैं कुछ नहीं कर पाता। जब मैं मुंबई आया तो मेरा छोटा भाई गांव में रुका था खेती देखने के लिए। अगर वो घर नहीं रुकता तो शायद मैं कुछ नहीं कर पाता। जब मैं पैसे कमाने लगा तो मैंने पहले उसका घर बनवाया यानी अपने गांव का घर फिर जाकर मैंने मुंबई में घर खरीदा। मैंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि मेरे भाई को कभी पछतावा हो कि अगर वो मुंबई गया होता तो आज उसकी जिंदगी और भी अच्छी होती।
आपको नहीं लगता कि आपकी बायोपिक बननी चाहिए? 
जी बिल्कुल नहीं, मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि स्ट्रगल, परेशानी हर किसी की जिंदगी में होती है, मगर बायोपिक उसकी जीवनी पर बनती है जो इन मुसीबतों के बाद बहुत बड़ा कुछ कर दिखाता है। मैं मानता हूं मैंने गांव में खेती तक की है, फिर स्पॉटबॉय भी रहा हूं, मगर मैंने डायरेक्टर बनकर ऐसा कुछ तीर नहीं मार दिया है कि मेरी बायोपिक बने। बायोपिक फिल्म के लिए और भी कुछ बड़ा करना पड़ेगा।
आपने मराठी फिल्में भी डायरेक्ट की हैं और अब एक हिंदी फिल्म भी डायरेक्ट कर चुके हैं, क्या अंतर पाते हैं दोनों ही भाषाओं की फिल्म मेकिंग में ?
मेरे खयाल से कोई भी अंतर नहीं है सिर्फ बजट का ही अंतर होता है। मराठी फिल्मों का बजट कम होता है और हिंदी फिल्मों में ऐसा नहीं होता। मराठी फिल्में 1 से 2 करोड़ के बीच बनानी होती है, कम बजट होने के कारण कहीं ना कहीं आपके हाथ बंध जाते हैं और आप अच्छी तरह से अपनी फिल्म को पेश नहीं कर पाते। दूसरी बात थिएटर भी बहुत कम मिलता है और ऑडियंस भी लिमिटेड हो जाती है, इसलिए आपका काम ज्यादा दूर तक नहीं पहुंच पाता लेकिन हिंदी फिल्म में आपका काम पूरे देश के छोटे-छोटे शहरों तक भी पहुंच जाता है।
फिल्म लुका छुप्पी डायरेक्ट करते वक्त सबसे ज्यादा मुश्किल क्या रहा? 
मेरे लिए पूरी फिल्म को डायरेक्ट करना ही बहुत मुश्किल भरा रहा। सबसे बड़ी मुश्किल थी कल्चर डिफरेंस की, बात यह है कि फिल्म लुका छुप्पी मथुरा की कहानी है, मगर मैं एक महाराष्ट्रीयन हूं, मेरे लिए वहां की सभ्यता को समझना और ऑडियंस के सामने उसे प्रस्तुत करना बहुत ही मुश्किल रहा। खानपान से लेकर दोनों के विचार में भी बहुत फर्क है, एेसे में मैं इंसाफ कर पाऊंगा या नहीं, इस बात का डर बना हुआ था लेकिन अब जब फिल्म लोगों को पसंद आ रही तो अच्छा लग रहा है क्योंकि जब आपका काम सराहा जाता है तो ऐसा लगता है कि चलो मेहनत सफल हुई।

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