अनमोल बोलः अकीरा कुरोसावा, महान फिल्म डायरेक्टर

डायरेक्टर की भूमिका एक ऐसी चारदीवारी की तरह होता होती है जिसमें अभिनेता की ट्रेनिंग, सिनेमटोग्राफी, साउंड रिकॉर्डिंग, आर्ट डायरेक्शन, संगीत, एडिटिंग, डबिंग औेर साउंड मिक्सिंग सब कुछ मौजूद रहता है। कुछ भी छिटक नहीं पाता। हालांकि इन सबको अलग-अलग कामों के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन जहां तक मेरा सवाल है, मैं इन्हें अलग करके नहीं देखता।

मैं डायरेक्शन की छत्र-छाया में इन सभी को एक-दूसरे में घुलते-मिलते देखता हूं। एक डायरेक्टर के पास किसी भी स्थिति का जवाब होना चाहिए। साथ ही उसकी लीडरशिप में वह काबिलियत होनी चाहिए कि पूरी यूनिट उसके आदेशों का पालन करे।

स्क्रिप्ट अगर दमदार हो तो एक अच्छा डायरेक्टर बेहतरीन फिल्म बना सकता है, जबकि यही स्क्रिप्ट किसी साधारण डायरेक्टर के पास पहुंच जाए तो वह एक साधारण फिल्म बना देगा। लेकिन स्क्रिप्ट ही अगर खराब हो तो बढ़िया डायरेक्टर भी एक अच्छी फिल्म नहीं बना सकता।

स्क्रिप्ट लिखते समय दुनिया के महान उपन्यासों और नाटकों को पहले पढ़ना चाहिए। यह विचार करना चाहिए कि ये कृतियां आखिर महान क्यों हैं? उन्हें पढ़ते वक्त जो भावुकता महसूस होती है वह कहां से आती है? लेखक ने भावुक चित्रण में कितनी ढिलाई दी और किरदार या घटनाओं के चित्रण में उस भावुकता पर किस हद तक कंट्रोल किया है। इन सभी बातों की विस्तार से स्टडी करनी चाहिए ताकि इन्हें समझने और सीखने में आसानी हो।

इसके लिए महान फिल्में भी देखनी चाहिए। महान स्क्रिप्ट्स को पढ़ने के अलावा महान डायरेक्टर्स की फिल्म संबंधी मान्यताओं और सिद्धांतों का भी अध्ययन करना चाहिए। अगर आपका लक्ष्य फिल्म डायरेक्टर बनना है तो पहले आपको स्क्रिप्ट राइटिंग में महारत हासिल करनी होगी।

एक अभिनेता की सबसे खराब स्थिति यह हो सकती है जब वह कैमरे के प्रति अलर्ट होने लगता है। अक्सर ऐसा होता है कि ‘रोल’ की आवाज सुनते ही अभिनेता टेंशन में आ जाता है, पहले जहां वह देख रहा होता है, वहां से निगाहें हटा लेता है और बहुत अननेचुरल ढंग से अपने को प्रस्तुत कर देता है।

यह अलर्टनेस कैमरे की निगाह से नहीं बच पाती। मैं तो हमेशा यही कहता हूं, अपने साथ वाले एक्टर से बात करो। यह थिएटर नहीं जहां आपको अपने डायलॉग दर्शकों से कहने हैं। कैमरे की ओर देखने की जरूरत ही नहीं।

कई लोग एक्टर्स का पीछा जूम लंेस से करना पसंद करते हैं। मेरी नजर में यह एकदम गलत तरीका है। कैमरे को एक्टर्स का पीछा उसी गति से करना चाहिए जिस गति से व एक्टर जा रहा हो। जब वह रूके तो उसे भी रूक जाना चाहिए। इस नियम को नहीं मानने से दर्शक कैमरे के मूवमेंट के प्रति सजग हो जाते हैं।

मिजोगुची केंजी पहले जापानी डायरेक्टर हैं, जिनके सेट्स और प्रॉप्स ऑथेंटिक होते हैं। उनकी फिल्मों के सेट्स वास्तव में बेहतरीन होतें हैं। फिल्ममेकिंग के बारे में मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा और उनमें सबसे इम्पोर्टेंट है सेट-निर्माण। सेट की क्वालिटी का असर एक्टर के काम की क्वालिटी पर पड़ता है।

जिस क्षण मैं फिल्म डायरेक्शन शुरू करता हूं। इसी क्षण से मैं न सिर्फ संगीत बल्कि साउंड इफेक्ट के बारे में भी सोचने लगता हूं। यहां तक कि कैमरा रोल करने से पहले जिन पहलुओं पर मैं विचार करता हूं उनमें यह भी शामिल होता है कि मुझे किस तरह का साउंड चाहिए।

एडिटिंग की सबसे बड़ी जरूरत ऑब्जक्टिविटी होती है। किसी खास शॉट को लेने में आपको कितनी दिक्कतें झेलनी पड़ी हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि दर्शक कभी ये जान नहीं पाएंगे। अगर आप फिल्माने के दौरान बहुत उत्साहित रहे हों लेकिन अगर वह उत्साह स्क्रीन पर उभरकर नहीं आता तो आप बेहरमी से आप इसे काट दीजिए।

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