अनमोल बोलः हृषिकेश मुखर्जी, फिल्म डायरेक्टर और एडिटर

डायरेक्टर और एडिटर के बीच विचार-मंथन शुरू होता है। कई बार एडिटर की बात ही मानी जाती है। खुद मेरीे अपनी डायरेक्टर और एडिटर दोनों पर्सनैलिटी में ऐसा संघर्ष कई बार हुआ है और अंत में एडिटर की जीत हुई है।
यहां मुझे एक रोचक घटना याद आ रही है।

एक बार किशोर कुमार से मुलाकात हुई। किशोर ने कहा, ‘हृषि दा, आज एक भयानक झगड़ा हो गया।’ ‘किससे किसका झगड़ा हो गया?’ मैंने पूछा। किशोर ने कहा, ‘एक प्रोड्यूसर-डायरेक्टर का एडिटर से।’ मेरी जिज्ञासा बढ़ी और मैंने पूछा, ‘झगड़े का कारण क्या था?’ उसने बताया कि प्रोड्यूसर-डायरेक्टर की राय में एक सीन ऐसा था जो उसे जरूरी लग रहा था। उसमें खर्च भी था।

लेकिन दूसरी ओर एडिटर का कहना था कि यह सीन जरूरी नहीं है। इसी बात पर दोनों में झगड़ा शुरू हो गया। प्रोड्यूसर-डायरेक्टर ने कहा कि मैं डायरेक्टर हूं, मैं इस सीन को शूट करूंगा। एडिटर ने कहा, कर लो। मैं इसे फेंक दूंगा।

 किशोर कुमार और हृषिकेश मुखर्जी

मैंने किशोर से कहा, ‘किशोर, यह तो एडिटर की ज्यादती है। अगर डायरेक्टर को लग रहा है कि सीन ऐसा है जिससे फिल्म अच्छी लगेगी ता ण्डिटर को चाहिए कि डायरेक्टर की बात मान ले और अगर एडिटर इससे इंकार करता है तो प्रोड्यूसर-डायरेक्टर को चाहिए कि एडिटर बदल दे। एडिटर का काम डायरेक्टर को सहयोग करना है।’

किशोर ने कहा, ‘हृषि दा, यही तो मुश्किल है।’ मैंने पूछा, ‘क्यों?’ उसने कहा कि ‘प्रोड्यूसर-डायरेक्टर किशोर कुमार है और एडिटर भी किशोर कुमार है।’

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