अनमोल बोल- हृषिकेश मुखर्जी, फिल्म डायरेक्टर और एडिटर

रामू कारित की फिल्म ‘चेम्मीन’ की एडिटिंग के लिए मैं मद्रास गया। फिल्म में जिस तरह से शॉट्स को सजाया गया था, वह मेरे मन के अनुकूल एकदम नहीं नहीं था। मैंने रामू से कहा कि तुम इस फिल्म के जरिए क्या कहना चाहते हो, यह मेरी समझ में आ गया है। लेकिन जिस तरह से कह रहे हो उस पर मेरी सहमति नहीं है। अगर तुम्हारी सहमति हो तो मैं शुरू की चार रील को अपनी तरह से उलट-पलटकर फिर से सजा देता हूं। अगर तुम्हें पसंद नहीं आए तो जैसा तुम चाहोगे वैसा कर दूंगा। आखिर एडिटर का काम डायरेक्टर के चाहे रिजल्ट को लाकर देना है।

मुझ पर विश्वास होने की वजह से रामू कारित मेरी बात पर सहमत हो गए। मैंने चालीस मिनट के शॉट्स को अपनी तरह से उलट-पलटकर सजा दिया। इसे देखकर रामू खुश हुआ और कहा, ‘यह फिल्म तुम्हारे हवाले है। तुम्हें जैसा अच्छा लगे वैसा करो।’ हालांकि यह ठीक है कि उन्होंने ऐसा कहा, लेकिन मैंने बिना उसकी परमिशन और अप्रूवल के कुछ भी नहीं किया।

फिल्म में सीन चेंज के लिए पहले ही लगभग पचास डिजॉल्व या मिक्स का इस्तेमाल किया जा चुका था। मेरी राय थी कि इससे फिल्म की स्पीड सही नहीं जा रही है। इससे बचने के लिए मैंने रामू से कहा कि मुझे किनारे से समुद्र की टकराती हुई लहर के कई शॉट्स लाकर दो।

चूंकि चेम्मीन की कहानी समुद्र के आस-पास की थी, इसलिए यह प्रासंगिक था। समुद्र के किनारे से टकराकर समुद्र की लहर का फैल जाने वाला शॉट लेकर टाइम लैप्स का इफेक्ट पैदा किया था। इससे फिल्म में नयापन आया और फिल्म की स्पीड भी सही हुई।

हालांकि मैंने इस सबका क्रेडिट रामू कारित का दिया है। क्योंकि इस तरह की क्रिएटिविटी की प्रेरणा उनकी फिल्म से ही मिली और यह था डायरेक्टर का एडिटर पर विश्वास। फिल्म को राष्ट्रपति स्वर्ण पदक मिला। इसके बाद सिलसिला ऐसा चला कि रामू कारित की सभी फिल्मों की एडिटिग मैंने की।

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