‘दंगल’ फेम डायरेक्टर नितेश तिवारी से उम्मीदें तो थीं लेकिन बहुत हाई प्रोफाइल स्टारकास्ट न होने की वजह से फिल्म बज नहीं बना पा रही थी। जिस तरह खान, कपूर, अक्षय या रणवीर की फिल्में रिलीज होने के साल भर पहले से सुर्खियों में रहती हैं। लेकिन अब लगता है कि माउथ पब्लिसिटी के दम पर यह फिल्म बहुत लंबी चलेगी और अपने जोनर की एक यादगार फिल्म मानी जाएगी।

हाल के बरसों में जोनर के मामले में भी बहुत एक्सपेरिमेंट हो रहे हैं। इस फिल्म में भी बाप बेटे की रिलेशनशिप, ब्वॉयफ्रेंड गर्लफ्रेंड ​का रोमांस और पति पत्नी बनने के बाद रिश्तों में दूरी, कॉलेज लाइफ की मस्ती, छिछोरे दोस्तों की अनोखी यारी, लूजर से फाइटर बनने की कहानी सब मिलकर एक यादगार अनुभव रचते हैं। फिल्म में अतीत से वर्तमान को और फाइटर पिता की कहानी से सरेंडर कर देने वाले बेटे की कहानी को बांध दिया गया है। और यह बंधन फिल्म को एक अलग उंचाई पर ले जाता है।

       डायरेक्टर नितेश तिवारी के साथ सुशांत

फिल्म की स्टोरीलाइन ये है कि अनिरुद्ध सुशांत सिंह राजपूत और माया श्रद्धा कपूर अपनी प्रफेशनल लाइफ में सफल हैं लेकिन रोमांस करके शादी करने वाले इस कपल की मैरिज लाइफ में अंडरस्टैंडिग की कमी के कारण दूरियां पैदा हो जाती हैं। और उनका इकलौता टीनेजर बेटा राघव इसमें सफर करता है।

अनिरुद्ध चाहता है कि राघव इंजीनियरिंग का एंट्रेंस पास करके बाप की तरह ही कामयाब इंजीनियर बने। उधर माया राघव से कहती है, कोई प्रेशर मत लो। पास हुए तो ठीक, नहीं हुए तो कोई बात नहीं। एंट्रेंस का रिजल्ट आता है और उसमें राघव फेल हो जाता है। उसके दिमाग में सिर्फ एक बात घूमने लगती है कि अब सब उसे लूजर कहेंगे। अब कुछ नहीं हो सकता। और वह सुसाइड कर लेता है। लेकिन हॉस्पिटल ले जाने पर किस्मत से उसकी जान बच जाती है। मगर उसके ब्रेन में सीरियस इंजरी होने की वजह से उसकी हालत क्रिटिकल हो जाती है।

ऐसे में एक पिता करता है एक अनोखी कोशिश। यहां से फिल्म में अतीत की यात्रा शुरू होती है और मुंबई के रेपुटेड इंजीनियरिंग कॉलेज की मौज मस्ती, रैंगिंग और लूजर से फाइटर बनने की कहानी चलती है। बरसों बाद कॉलेज के हॉस्टल 4 के सभी दोस्तों का हॉस्पिटल में ही रियूनियन होता है। ये कहानी इतनी इंट्रेस्टिंग है कि इसके बारे में बताकर फिल्म का मजा किरकिरा करना हमें गवारा नहीं।

डायरेक्शन की बात करें तो नितेश तिवारी ने एक बेहतरीन फिल्म बनाई है। बल्कि अगर दंगल फेम डायरेक्टर ने एक मामूली फिल्म बनाई होती तो यह अलबत्ता हैरत की बात होती। फिल्म की कास्टिंग, अतीत से वर्तमान की कथा की बुनाई, बाप बेटे के रिश्ते से लेकर स्पोर्ट्स चैम्पियनशिप जैसे अलग अलग मोर्चों को बराबर मजबूती से थामकर नितेश तिवारी और उनकी टीम ने एक बड़ी मिसाल कायम की है। डायरेक्टर की जितनी तारीफ की जाए कम है।

 Chhichhore की स्पेशल स्क्रीनिंग के लिए जाते सुशांत और श्रद्धा

फिल्म की स्क्रिप्ट और डायलॉग्स बहुत अच्छे हैं। मसखरेपन और संजीदगी दोनों ही मौकों पर डायलॉग राइटर ने अपना सौ परसेंट दिया है।

फिल्म में कैमरे का काम बहुत इंप्रेसिव है। सेट, लोकेशन और मेकअप से गहरा तालमेल बिठाया गया है। कैमरे में अतीत के रंगों को बचाकर रखा गया है। हॉस्टल लाइफ को रिएलिटी के करीब रखने में सफलता मिली है। रैगिंग बैन होने से पहले किस हद तक फ्रेशर्स की इंसल्ट की जाती थी, इसे कैमरे ने खूबसूरती से पकड़ा है। स्पोर्ट्स चैम्पियनशिप के फास्ट मूवमेंट्स को कैद करने में भी कैमरे ने कोई गलती नहीं की है।

फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म के माहौल को सूट करता है। गाने बहुत यादगार नहीं हैं लेकिन फिल्म में अच्छे लगते हैं। किसी हालिया फैशन को दुहराने की कोशिश नहीं की गई है। न कोई आइटम सॉन्ग, न रैप और न कोई पंजाबी तड़का। यह कंटेट के प्रति डायरेक्टर की ईमानदारी और कमिटमेंट को दर्शाता है। और तारीफ प्रड्यूसर की भी करनी होगी जिसने डायरेक्टर पर कोई प्रेशर नहीं डाला। या फिर डायरेक्टर की अपनी शर्तों का उसने उचित सम्मान किया। आखिर ‘दंगल’ जैसी बेशुमार तारीफ और करोड़ों की कमाई करने वाली फिल्म के डायरेक्टर जो ठहरे!

आप कहेंगे यह समीक्षक शायद एक्टर्स को भूल गया है। जी नहीं। लेकिन इस फिल्म में इतने सारे छुपे रुस्तम हैं कि सबकी एक्टिंग पर बात करें तो यह समीक्षा बहुत लंबी हो जाएगी और शायद आप कहें कि समीक्षक तारीफों के पुल बांध रहा है। हम यही कहेंगे कि आप फिल्म देखें। ये एक मस्ट वॉच फिल्म है।

एक पढ़ने लिखने वाली, बिंदास लड़की और अपने बेटे की चिंता में परेशानहाल मां के रोल में जान डाल दी है श्रद्धा ने। अपने चेहरे की शरारत और मासूमियत से अपनी उम्र को कॉलेज स्टुडेंट की उम्र में ढाल लेने में सुशांत ने कमाल किया है। एक पति और पिता के रोल को भी उन्होंने बखूबी जिया है।

वरूण शर्मा फिल्म में पटाखा नहीं एटम बम का काम करते हैं। फिल्म में पूरी तरह वे छाए हुए हैं। सेक्सा के नाम से मशहूर, पोर्न फिल्में देखने के शौकीन गुरमीत सिंह ढिल्लों को जब उसके पिता पूछते हैं, और ये तुम्हें सब सेक्सा क्यों बोल रहे थे तो वो बोलता है, पापा, वो मैं ब​हुत सेक्सी हूं ना इसीलिए। स्पोर्ट्स चैम्पयनशिप के लिए जब सभी दोस्त स्लोगन बनाने का प्लान करते हैं और बेकार स्लोगन बनते हैं तो सेक्सा एसिड को डांटता है, अबे साले, पूरा एक दिन दिया और तूने पॉटी पे धनियां…

कम्मो, सेक्सा, एसिड, मम्मी, बेवड़ा ये किरदारों के निकनेम हैं और सभी एक्टर्स ने इसे परदे पर जिया है। फिल्म दोस्तों और पैरेंट्स के लिए बहुत अच्छी है। पूरी फैमिली के लिए थोड़ी कम अच्छी है क्योंकि पोर्न, प्लेब्वॉय और मास्टरबेशन की चर्चा से वे असहज हो सकते हैं।

 

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